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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 95 of 1416

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Page 95

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ६३


वृषातरुणभीरुभिः सह भवन्ति सन्धिग्रहो-
रुजोरुपरिसंक्रमभ्रमणपक्षघाता रुजाः ॥ ३३ ॥

बच, पित्तपापड़ा, धमासा, पियाबाँसा, गिलोय, अतीस, देवदारु, नागरमोथा, सोंठ, विधारा, दारुहल्दी, रास्ना, गूगल, अडूसा, अण्डकी जड़ और शतावर इन सब ओषधियोंको समानभाग लेकर क्वाथ बनाकर पान करनेसे सन्धिस्थानोंकी पीड़ा, जंघाओंका स्तम्भित होना, क्लान्ति ( शिथिलता ), भ्रम, पक्षाघात ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ३३ ॥

मुस्तादि

मुस्तैरण्डः प्राणदा बाणदारुच्छित्ना रास्ना भीरुकर्चूरतिक्ता ।
वासाविश्वापञ्चमूलाश्वगन्धा हन्यान्मन्यास्तम्भसंधिग्रहार्त्तीः ॥

नागरमोथा, अण्डकी जड़, हरड़, नीली कटसरैया, देवदारु, गिलोय, रास्ना, शतावर, कचूर, कुटकी, अडूसा, सोंठ, लघुपञ्चमूल और असगन्ध इन ओषधियोंका क्वाथ मन्यास्तम्भ ( नाड़ीका जकड़ जाना ) और सन्धियोंकी पीड़ा सहित सन्निपात ज्वरको दूर करता है ॥ ३४ ॥

अभिन्यासज्वरकी चिकित्सा ।

निद्रोपेतमभिन्यासक्षीशं विद्याद्धतौजसम् ।
सन्निपाते प्रकम्पन्तं प्रलपन्तं न बृंहयेत् ॥ ३५ ॥
तृष्णादाहाभिभूतेषु न दद्याच्छीतलं जलम् ।
वातपित्तोल्बणे चैव घृतं योज्यं पुरातनम् ॥ ३६ ॥
अभ्यंगात शमयत्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ।
स्वेदोद्गमे ज्वरे देयश्चूर्णो भृष्टकुलत्थजः ॥ ३७ ॥

सन्निपातज्वरमें अधिक निद्राका आना, बलका क्षीण होना, ओजका नाश होना, रोगीके शरीरमें कम्प और प्रलाप करना आदि लक्षणोंके होनेपर अभिन्यासज्वर जानना चाहिये। इस ज्वरमें बृंहणक्रिया नहीं करनी चाहिये। और रोगीके अत्यन्त तृषा वा दाहके होनेपर शीतल जल नहीं देना चाहिये। अभिन्यासज्वरमें वात-पित्तकी अधिकता होनेपर पुराने घृतकी शरीरपर मालिश करनी चाहिये। यदि इस ज्वरमें पसीना अधिक आता हो तो भुनी हुई कुलथीका चूर्ण मलना चाहिये ॥ ३५–३७ ॥