भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ९२७
तैयार करलेवे । यह रस यथाविधि सेवन करनेपर प्लीहा, यकृत्, गुल्म, अष्ठील',
अग्रमांस, सूजन, सर्व प्रकारके उदरसम्बन्धी रोग, वातरक्त, जठराग्नि और अन्त-
र्विद्रधि रोगको दूर करता है ॥ ७४-७८ ॥
रोहीतकलोह ।
रोहीतकसमायुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः ।
प्लीहानमग्रमांसं च शोथं हन्ति न संशयः ॥ ७९ ॥
रोहेडेकी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, वायविडङ्ग, नागर-
मोथा और चीतेकी जड इन सबको समान भाग और सबको बराबर लोहभस्म
मिलाकर शहदके साथ लोहेके पात्रमें खरल कर लेवे । यह लोह प्लीहा ( तिल्ली ),
अग्रमांस तथा सूजनको सन्देहरहित नष्ट करता है ॥ ७९ ॥
चित्रकादिलौह ।
चित्रकं नागरं वासा गुडूची शालपर्णिका ।
तालपुष्पमपामार्गो मानकं कार्षिकत्रयम् ॥ ८० ॥
लौहमभ्रं कणा ताम्रं क्षारको लवणानि च ।
पृथक् कर्षांशमेतेषां चूर्णमेकत्र चिक्कणम् ॥ ८१ ॥
चतुःप्रस्थे गवां मूत्रे पचेन्मन्देन वह्निना ।
सिद्धशीतं समुद्धृत्य माक्षिकं द्विपलं क्षिपेत् ॥ ८२ ॥
चित्रकादिरयं लौहो गुल्मप्लीहोदरामयम् ।
यकृतं ग्रहणीं हन्ति शोथं मन्दानलं ज्वरम् ॥
कामलां पाण्डुरोगं च गुदभ्रंशं प्रवाहिकाम् ॥ ८३ ॥
चीतेकी जड, सोंठ, अडूसा, गिलोय, शालपर्णी, ताडके, फूल, चिरचिटा और
मानकन्द ये प्रत्येक तीन तीन कर्ष, लोहा, अभ्रकभस्म, पीपल, ताम्रभस्म, जवाखार
और पाँचोंनमक इनको पृथक् पृथक् एकएक कर्ष लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस
चूर्णको चार प्रस्थ ( २५६ तोले ) गोमूत्रमें मन्द मन्द अग्निद्वारा पकावे । जब
अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उतारले और शीतल होजानेपर उसमें ८
तोले उत्तम शहद मिलादेवे । इसका नाम चित्रकादि लोह है । यह गुल्म, प्लीहा,
उदरविकार, यकृत्, संग्रहणी, सूजन, अग्निकी मन्दता, ज्वर, कामला, पाण्डुरोग,
गुदभ्रंश, प्रवाहिका इत्यादि व्याधियोंको नाशता है ॥