भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ९२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्लीह-यकृत्- |
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शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा और आमला ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला एवं शुद्ध जमाल गोटा सबसे आधा भाग लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर ढाकके रसमें एकमासपर्य्यन्त खरल-करे और एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे ॥
वाटिका प्रदातव्या शृङ्गवेररसेन च ।
गुदांकुरे गुल्मशूले प्लीहशोथे कफात्मके ॥ ७२ ॥
उदावर्ते वातशूले श्वासकासज्वरेषु च ।
रसः प्लीहारिनामाऽयं कोष्ठामयविनाशनः ॥
आमवातगदच्छेदी श्लेष्मा मयविनाशनः ॥ ७३ ॥
इस रसकी प्रतिदिन एक २ गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे गुदांकुर, गुल्मशूल, प्लीहा, शोथ, कफजन्य उदावर्त्त, वातशूल, श्वास, खाँसी और ज्वरादि-रोगोंमें शीघ्र आरोग्यता प्राप्त होती है । यह प्लीहारिनामकरस कोष्ठस्थित विकार, आमवात और कफोत्पन्न समस्त रोगोंको नष्ट करता है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
लौहमृत्युञ्जयरस ।
रसगन्धकलौहाभ्रं कुनटी मृतताम्रकम् ।
विषमुष्टिवराटं च तुत्थं शङ्खो रसाञ्जनम् ॥ ७४ ॥
जातीफलं च कटुकी द्विक्षारं कनकं तथा ।
हिङ्गु व्योषं सैन्धवं च प्रत्येकं सूततुल्यकम् ॥ ७५ ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वमेकत्र भावयेत्ततः ।
सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च ॥ ७६ ॥
सूर्यावर्तेन मतिमान् वटिकां कारयेत्ततः ।
प्लीहानं यकृतं गुल्ममष्ठीलां च विनाशयेत् ॥ ७७ ॥
अग्रमांसं तथा शोथं तथा सर्वोदरणि च ।
वातरक्तं च जठरमन्तर्विद्रधिमेव च ॥ ७८ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, अभ्रक, मैनसिल, ताँबेकी भस्म, कुचला, कौडीकी भस्म, नीलाथोथा, शंखभस्म, रसौंत, जायफल, कुटकी, जवाखार, सज्जी, जमाल गोटा, त्रिकुटा, हींग और सेंधानमक ये प्रत्येक एकएक तोला लेकर एकत्र कूट पीसलेवे । पश्चात् इस चूर्णको हुलहुल और बेलके पत्तोंके रसमें भावना देवे । फिर हुलहुलके रसद्वारा यथाविधि खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ