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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 916 of 1416

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Page 916

८८४ भैषज्यरत्नावली । [ सोमरोग-

गगनादिलौह।

गगनं त्रिफ़ला लौहं कुटजं कटुकत्रयम् ।
पारदं गन्धकं चैव विषटङ्कणसर्जिकाः ॥ १६ ॥
त्वगेला तेजपत्रं च वङ्गं जीरकयुग्मकम् ।
एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ १७ ॥
तदर्द्धं चित्रकं चूर्णं कार्षिकं मधुना लिहेत् ।
अवश्यं विनिहन्त्याशु मूत्रातीसारसोमकम् ॥ १८ ॥

अभ्रकभस्म, त्रिफला, लोहभस्म, कुडेकी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, शुद्ध पारेकी भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, सुहागा, सज्जी, दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, वंगभस्म, जीरा और कालाजीरा ये प्रत्येक एक एक तोला लेकर एकत्र कूट पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे और सब चूर्णसे आधा चीतेकी जडका चूर्ण मिलालेवे। प्रतिदिन इस चूर्णको एक कर्ष परिमाण शहदमें मिलाकर चाटे तो मूत्रातीसार और सोमरोग अवश्यमेव दूर होता है ॥ १६-१८ ॥

सोमनाथरस।

कर्षं जारितलौहं च तदर्द्धं रसगन्धकम् ।
एला पत्रं निशायुग्मं जम्बु वीरणगोक्षुरम् ॥ १९ ॥
विडङ्गं जीरकं पाठा धात्री दाडिमटङ्कणम् ।
चन्दनं गुग्गुलुर्लोध्रं शालार्जुनरसाञ्जनम् ॥
छागीदुग्धेन वाटिकां कारयेद्दशरक्तिकाम् ॥ २० ॥

लोहेकी भस्म २ तोले, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक एक एक तोला एवं छोटी इलायची, तेजपात, हल्दी, दारुहल्दी, जामुनकी छाल, खसका मूल, गोखुरू, वायविडंग, जीरा, पाठ, आमले, अनारदाना, सुहागा, चन्दन, गूगल, लोध, राल, अर्जुनछाल और रसौंत इन औषधियोंके चूर्णको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें यथाविधि खरल करके दस दस रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ १९ ॥ २० ॥

निर्मितो नित्यनाथेन सोमनाथरसस्त्वयम् ।
सोमरोगं बहुविधं प्रदरं हन्ति दुर्जयम् ॥ २१ ॥
योनिशूलं मेद्रशूलं सर्वजं चिरकालजम् ।
बहुमूत्रं विशेषेण दुर्जयं हन्त्यसंशयम् ॥ २२ ॥