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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 915 of 1416

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Page 915

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८८३


कच्चे ताडकी जड, खरजूकी जड और केलेकी पकी फली इनको बराबर २ लेकर दूधके साथ प्रतिदिन प्रातःकाल पान करे तो मूत्रातीसार दूर होय ॥ ९ ॥

माषचूर्णं समधुकं विदारी शर्करा मधु ।
पयसा पाययेत्प्रातः सोमरोगविनाशनम् ॥ १० ॥

उडदोंका चूर्ण, मुलहठीका चूर्ण, विदारीकन्दका चूर्ण, चीनी और शहद ये सब समानांश लेकर दूधके साथ प्रातःसमय पान करे तो सोमरोग शमन होता है ॥

बहुमूत्रं तथा चान्यान् रोगांश्चैव तदुद्भवान् ।
तृष्णाधिके प्रदातव्यं शृतशीतमिदं शुभम् ॥ ११ ॥
सारिवा मधुकं द्राक्षा दर्भः सरलचन्दने ।
पथ्या मधुकपुष्पं च सर्वं च समभागकम् ॥ १२ ॥
जले संस्थाप्य रजनीं पराह्ने वस्त्रगालितम् ।
प्रोक्तं गहननाथेन सद्यस्तृष्णाहरं परम् ॥ १३ ॥

बहुमूत्ररोगमें अन्यान्य उपद्रवोंके उत्पन्न होनेपर तृषा अधिक लगे तो सारिवा, मुलहठी, दाख, कुशा, धूपसरल, लालचन्दन, हरड और महुएके फूल इन सबको समान भाग मिश्रित दो तोले लेवे और रात्रिके समय मिट्टीके स्वच्छ पात्रमें कुछ थोडासा जल डालकर भिगो देवे । फिर अगले दिन प्रातःकाल वस्त्रमें छानकर इस शीतल जलको पीनेसे तृषाका वेग शीघ्र शान्त होता है । श्रीगहनानन्दनाथने ऐसा कहा है ॥ ११-१३ ॥

तारकेश्वररस ।

मृतं सूतं मृतं लौहं मृतं वङ्गाभ्रकं समम् ।
मर्दयेन्मधुना चैत्र रसोऽयं तारकेश्वरः ॥ १४ ॥
माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये ।
औदुम्बर फलं पक्वं चूर्णितं मधुना लिहेत् ॥ १५ ॥

शुद्ध पारेकी भस्म, लोहभस्म, वंगभस्म और अभ्रकभस्म इनको समान भाग लेकर शहदमें खरल करलेवे । इस प्रकार इस तारकेश्वररसको सिद्ध कर इसको एक एक माशा नित्यप्रति प्रातःसमय शहदमें मिलाकर सेवन करे और पीछेसे गूलरके पके फलोंके १ तोला चूर्णको शहदके साथ मिश्रितकर चाटे तो बहुमूत्ररोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥ १५ ॥