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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 899 of 1416

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Page 899

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६७

इसके सेवन करनेसे प्रमेह और वीर्य्यक्षीणतादि रोग तीन रातमें ही निस्सन्देह इस प्रकार नष्ट होजाते हैं, जैसे सिंह गजेन्द्रको नष्ट करदेता है ॥ ७४ ॥

मेहान्तकरस ।

रसगन्धकलौहं च तारं वङ्गं त्रिभागिकम् ।
अभ्रकस्य त्रयो भागा भागाद्धैन सुवर्णकम् ॥ ७५ ॥
सर्वचूर्णसमं दद्यात्तालमूलीसुचूर्णितम् ।
नानारोगहरं श्रेष्ठं वातपित्तभवं महत् ॥
कान्तिपुष्टिकरं चैव रतिशक्तिविवर्द्धनम् ॥ ७६ ॥

शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, रूपा, वङ्ग और अभ्रक ये प्रत्येक तीन तीन तोले एवं स्वर्णभस्म ६ माशे और मुसलीका चूर्ण १८।। तोले लेकर एकत्र पीसकर जलमें खरल करके तीन तीन माशेकी गोलियाँ बनालेवे। यह रस वात और पित्तसे हुए दुस्तर प्रमेहों तथा अनेक प्रकारकी उत्कट व्याधियोंको नाश करता है। इसी भाँति अत्यन्त पुष्टिकारक एवं कान्ति और रतिशक्तिकी वृद्धि करने-वाला ॥ ७५ ॥ ७६ ॥

सर्वेश्वररस ।

स्वर्णं रौप्यं मौक्तिकं च विशुद्धं च शिलाजतु ।
लौहमभ्रं तथा ताप्यं मधुयष्टी च पिप्पली ॥ ७७ ॥
मरिचं विश्वकं चेति सर्वमेकत्र कारयेत् ।
विमर्द्य प्रहरं यत्नात्कज्जलाकृतिसन्निभम् ॥ ७८ ॥
केशराजभृङ्गराजशक्रासनरसे पृथक् ।
प्रमेहं विविधं हन्ति मधुमेहं सुदुर्जयम् ॥ ७९ ॥
वातपित्तसमुद्भूतं तथा कफसमुद्भवम् ।
सर्वेश्वरो रसो नाम्ना प्रमेहकुलनाशकः ॥ ८० ॥

सुवर्ण, चाँदी, मोती, शुद्धशिलाजित, लोहा, अभ्रक, सोनामाखी, मुलहठी, पीपल, काली मिर्च और सोंठ इन सबको समान भाग लेवे फिर एकत्र पीसकर काले भाङ्गरे, सफेद भांगरे और भाँगके रसमें क्रमानुसार पृथक् पृथक् एक एक प्रहरतक खूब खरल करे। जब घुटकर काजलकी समान वर्ण होजाय तब दो दो रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे। यह रस वातज, पित्तज, कफज एवं अन्यान्य दोष-जात बीसों प्रकारके प्रमेह और दुर्जेय मधुमेह रोगको मूलसहित नष्ट करता है। इसको सर्वेश्वररस कहते हैं ॥ ७७–८० ॥