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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 898 of 1416

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Page 898

८६६ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह-

स्वर्णवंग ।

प्रक्षिपेद्भाजने वङ्गमायसे चापि मृन्मये ।
विद्रुते वह्नितापेन तस्मिंस्तन्मानकं रसम् ॥ ६८ ॥
क्षिप्त्वा संचूर्णयेत्तत्र नरसारं च गन्धकम् ।
तरुवासो मृदा लिप्त्वा काचकूप्यां निधाय च ॥ ६९ ॥
तत्सर्वं सिकतायन्त्रे पचेद्यामचतुष्टयम् ।
पाकात्सञ्जायते चित्रं कीर्णं हेमकणैरिव ॥ ७० ॥
रमणीयतरं स्वर्णवङ्गं नाम रसायनम् ।
बल्यं मेहहरं कान्तिमेधावीर्याग्निवर्द्धनम् ॥ ७१ ॥

किसी लोहेके या मिट्टीके बर्त्तनमें वंग (राँग) को रखकर तीक्ष्ण अग्निमें गलावे। जब वह अच्छे प्रकार गलजाय तब निकालकर उसके बराबर शुद्ध पारा, पारेके बराबर शुद्ध गन्धक और गन्धककी बराबर नौसादर मिलाकर बारीक चूर्ण करलेवे। तदनन्तर इस चूर्णको बोतलमें भरकर और उसके ऊपर कपरामट्टी करके वालुकायन्त्रमें रख चार प्रहरतक पकावे। पककर जब बोतलके अन्दर सुवर्णके कणोंके समान बिखरजाय तब यह स्वर्णवंगनामवाली अत्युत्तम रसायन तैयार होती है। यह सर्वप्रकारके प्रमेहोंको दूर करती है एवं अत्यन्त बलकारक, कान्तिजनक, मेधा वीर्य और उदराग्निको बढाती है ॥ ६८-७१ ॥

मेहकेशरी ।

मृतं वङ्गं सुवर्णं च कान्तलौहं च पारदम् ।
मुक्तं गुडत्वचं चैव सूक्ष्मैला पत्रकेशरम् ॥ ७२ ॥
समभागं विचूर्ण्याथ कन्यानीरेण भावयेत् ।
द्विमाषां वटिकां खादेद् दुग्धान्नं प्रपिबेत्ततः ॥ ७३ ॥

वङ्गभस्म, सुवर्णभस्म, कान्तलोहभस्म, शुद्ध पारदभस्म, मोतीभस्म, दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेशर इनको समान भाग लेकर एकत्र बारीक चूर्ण करके घीग्वारके रसमें यथाविधि खरल करे। फिर दो दो माशेकी गोलियाँ बनालेवे। इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खाय और इसपर दुग्ध भात भक्षण करे ॥ ७२ ॥ ७३ ॥

प्रमेहं नाशयेदाशु केसरी करिणं यथा ।
शुक्रप्रवाहं शमयेत्त्रिरात्रान्नात्र संशयः ॥ ७४ ॥