भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context८५६ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-
नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर कच्चा दूध और शीतल जल समान भाग मिलाकर पान करनेसे पुराना शुक्रप्रमेहरोग निश्चय नष्ट होताहै ॥ ९ ॥
पलाशपुष्पत्तोलैकं सितायाश्चार्द्धतोलकम् ।
पिष्टं शीताम्भसा पीतं मेहं हन्ति न संशयः ॥ १० ॥
टेसूके फूल एक तोला और मिश्री ६ माशे इन दोनोंको शीतल जलमें पीसकर पीवे तो प्रमेह दूर होता है ॥ १० ॥
स्फाटिकं चूर्णमादाय नारिकेलोदरे क्षिपेत् ।
तत्फलं पङ्कमध्ये तु स्थापयेदेकरात्रकम् ॥ ११ ॥
प्रातरानीय सजलं चूर्णं पेयं प्रयत्नतः ।
अनेन चिरकालीनो मेहो नश्यति निश्चितम् ॥ १२ ॥
फिटकिरीके चूर्णको नारियलमें भरकर कीचडमें गाड देवे और एक रात्रितक गडा रहनेदेवे । फिर प्रातःसमय निकालकर उसमेंसे फिटकिरीके चूर्णको ले जलमें पीसकर पान करे । इससे बहुत पुराना प्रमेहरोग निश्चय नाशहो ॥ ११ ॥ १२ ॥
व्यायामजातमखिलं भजन्मेहान् व्यपोहति ।
पादत्रच्छत्ररहितो भिक्षाशी मुनिवद्यतः ॥ १३ ॥
योजनानां शतं गच्छेदधिकं वा निरन्तरम् ।
मेहाञ्जेतुं वने वापि नीवारामलकाशनः ॥ १४ ॥
व्यायाम (दण्ड-कसरत अथवा किसी प्रकारका परिश्रम) करनेसे सब प्रमेह दूर होते हैं । जूता, खडाऊँ और छत्तरीको त्याग (अर्थात् नंगे पाँव नंगे शिर) मुनियोंके समान संयतेन्द्रिय होकर भिक्षा माँगकर भोजन करे और ४०० कोसतक अथवा इससे भी अधिक दूरतक निरन्तर भ्रमण करे एवं वनवासी होकर नीवार व आमलोंका भोजन कर निर्वाह करता हुआ प्रमेहोंको जीते अर्थात् इस प्रकारके कृत्य करनेसे प्रमेह शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ १३ ॥ १४ ॥
माक्षिकं धातुमप्येवं युञ्ज्यादस्याप्ययं गुणः ॥ १५ ॥
पूर्वोल्लिखित शिलाजीतके प्रयोगके नियमानुसारही शुद्ध की हुई सोनामाखीके चूर्णको सेवन करनेसे प्रमेहरोग शमन होता है। यह धातु भी शिलाजीतके समान गुणोंवाली है ॥ १५ ॥
फलत्रिकादि ।
फलत्रिकं दारुनिशां विशालां मुस्तां च निःक्वाथ्य