Skip to content
SarvaKosh
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 887 of 1416

Read in context
Page 887

चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ६५५

बहुत पुराने समेके चावल, कोदों, वनकोदों, गेहूँ, चने, अरहर और कुलथी ये सब अन्न प्रमेहरोगियोंको खाने चाहिये । एवं जङ्गली पशु-पक्षियोंका मांसरस, कडुवै शाक, जौके बने अन्न और शहद इनका सेवन तथा परिभ्रमण करना इस रोगमें विशेष हितप्रद हैं ॥ ४ ॥

रूक्षमुद्वर्त्तनं गाढं व्यायामो निशि जागरः ।
यच्चान्यच्छ्लेष्मपित्तघ्नं बहिरन्तश्च तद्धितम् ॥ ५ ॥

रूखे (बेसन आदि) पदार्थोंकी शरीरपर खूब जोरसे मालिश करना, दण्ड-कसरत, भ्रमण, रातमें जागना और शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाद्वारा जो कफ-पित्तको नष्ट करे ऐसे पदार्थ प्रमेहरोगियोंको हितकारी हैं ॥ ५ ॥

सर्वमेहहरो धात्र्या रसः क्षौद्रनिशायुतः ।
कषायस्त्रिफलादारुमुस्तकैर्वाथवा कृतः ॥
त्रिफलादारुदार्ब्यब्दक्वाथः क्षौद्रेण मेहहा ॥ ६ ॥

आंवलोंके रसमें शहद और हल्दीका चूर्ण मिलाकर सेवन करे तो सर्वप्रकार का प्रमेह नष्ट होता है अथवा त्रिफला, देवदारु और नागरमोथा इनके क्वाथमें शहद और हल्दीका चूर्ण डालकर पान करे किंवा हरड, बहेडा, आमला देवदारु, दारुहल्दी और नागरमोथा इनके क्वाथको मधु मिश्रितकर भक्षण करनेसे प्रमेह दूर होता है ॥ ६ ॥

त्रिफलालौहशिलाजतुपथ्याचूर्णं च लीढमेकैकम् ।
मधुनाऽमरास्वरस इव सर्वान्मेहान्निवारयति ॥
पीतः सारो गुडूच्यास्तु मधुना तत्प्रमेहहुत् ॥ ७ ॥

त्रिफलेका चूर्ण लोहभस्म, शिलाजीत और हरडोंका चूर्ण इनमेंसे किसी एकको शहदमें मिलाकर चाटे अथवा केवल गिलोयका रस और मधु एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके प्रमेहरोग निवृत्त होते हैं । गिलोयके सार (गूदा) को शहदमें मिलाकर पीतेही प्रमेह नष्ट होता है ॥ ७ ॥

शतावर्या रसं रोगी क्षीरेण सह यः पिबेत् ।
प्रमेहा विंशतिस्तस्य क्षयं यान्ति न संशयः ॥ ८ ॥

शतावरके रस और दूधको एकत्र मिलाकर पान करे तो बीसों प्रकारके प्रमेह तत्काल नाश होते हैं । इसमें किञ्चिन्मात्र सन्देह नहीं है ॥ ८ ॥

आमदुग्धं समजलं यः पिबेत्प्रातुरुत्थितः ।
निस्संशयं शुक्रमेहः पुराणस्तस्य नश्यति ॥ ९ ॥