भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७५
रास्ना सैन्धवपिप्पल्यौ मांसीमञ्जिष्ठयष्टिकाः ।
तथा मेदा महामेदा जीवकर्षभकौ पुनः ॥ ३९० ॥
शतपुष्पा व्याघ्रनखं शुण्ठी देवाह्वमेव च ।
काकोली क्षीरकाकोली वचा भल्लातकं तथा ॥ ९१ ॥
पेषयित्वा समानेतानत्साधनीया प्रसारणी ।
नातिपक्वं न हीनं च सिद्धं पूतं निधापयेत् ॥ ९२ ॥
शरदृतुमें मूल और पत्तोंसहित प्रसारणीको उखाड़कर १०० पल लेवे, पियावाँसा १०० पल, शतावर १०० पल, खिरेंटी १०० पल, कौंचकी जड़ १०० पल, असगन्ध १०० पल और केतकी १०० पल इन सबोंको अलग २ कूटकर चार सौ चार सौ पल जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दहीका तोड़, बकरेके मांसका रस, चूका, दूध, दही और तिलका तैल ये प्रत्येक २क एक आढक ( २५६ तोले ) एवं तगर, मैनफल, कूठ, केशर, नागरमोथा, दालचीनी, रास्ना, सेंधानमक, पीपल, बालछड, मंजीठ, मुलहठी, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, सोया, नख, सोंठ, देवदारु, काकोली, क्षीरकाकोली, वच और भिलावे इन प्रत्येक द्रव्योंको दो दो तोले परिमाण पीसकर डालदेवे । फिर सबको यथाविधि एकत्र कर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे । इस तेलको न तो बहुत पकावे और न कच्चा रक्खे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छान लेवे और शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे ॥८६॥३९२॥
यत्र यत्र प्रदातव्या तन्मे निगदतः शृणु ।
कुब्जानामथ पंगूनां वामनानां तथैव च ॥ ९३ ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं ये च भग्नास्थिसन्धयः ।
वातशोणितदुष्टानां वातोपहतचेतसाम् ॥ ९४ ॥
स्त्रीमद्यक्षीणशुक्राणां वाजीकरणमुत्तमम् ।
वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये चैव प्रयोजयेत् ॥
प्रयुक्तं शमयत्याशु वातजान्विविधान् गदान् ॥ ९५ ॥
जिस २ रोगमें इस तैलको देना चाहिये, उसको कहते हैं सुनो—कुबड़े लँगड़े और बौने मनुष्य एवं जिसका एक अङ्ग सूख गया हो, जिनकी हड्डियें और सन्धियें टूटगईं हों, वातरक्तसे पीडित, दूषितवातसे नष्ट होगया है चित्त जिनका ऐसे अधिक स्त्रीप्रसङ्ग, अत्यन्तमद्यपान करनेवाले और क्षीणवीर्यवाले मनुष्योंके