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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 696 of 1416

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Page 696
६६४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

विनीय पाचयेत्तैलं प्रस्थं रुबुसमुद्भवम् ।
प्रस्थे च नकुलमांसस्य क्वाथे च दशमूलजे ।
प्रस्थे च काञ्जिकस्यापि मस्तुप्रस्थे तथैव च ॥ १६ ॥

नौलेका मांसरस, दशमूलका क्वाथ, काँजी और दहीका तोड इन सबको एक-एक प्रस्थ लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर इसमें अण्डीका तेल एक प्रस्थ और कल्कके लिये मुलहठी, जीरा, रासन, सैंधानमक, सोया, अजवायन, मिरच, कूट, वाय-विडङ्ग, गजपीपल, कालानमक, अजमोद, खिरेंटी, वच, पीपलामूल, मूरिछरीला और बालछड इन प्रत्येकके कल्कको दो दो तोले डालकर विधिपूर्वक तेलको पकावे ॥ १४-१६ ॥

सिद्धं तैलमिदं हन्ति कम्पवातं सुदारुणम् ।
हस्तकम्पं शिरःकम्पं बाहुकम्पं च नाशयेत् ॥ १७ ॥
आमवातं समूलं च सर्वोपद्रवसंयुतम् ।
पानाभ्यञ्जनवस्तीभिर्नाशयेन्नात्र संशयः ॥ १८ ॥
आढ्यवातं कटीपृष्ठजानुजङ्घाश्रितं तथा ।
सन्धिस्थं वातमाश्वेव जयेन्नकुलसंज्ञकम् ॥ १९ ॥
हारीतभाषितमिदं तैलं हितचिकीर्षया ।
वैद्यानां सारभूतानां शतेनापि समुज्झितम् ॥ ३२० ॥
वातव्याधिनिहन्त्याशु कम्पवातं विशेषतः ।
अशीतिं वातजान्रोगान्नाशयेदाशु देहिनाम् ॥ २१ ॥

इस प्रकार सिद्ध कियाहुआ यह तैल दारुण कम्पवात, हाथोंका काँपना, शिरका काँपना, बाहुओंका काँपना, सर्वप्रकारके उपद्रव और शूलसहित आमवातरोग इन सबको निश्चय नाश करता है। इस नकुलनामक तैलको पान, मर्द्दन और वस्ति-क्रियाद्वारा प्रयोग करनेसे आढ्यवात एवं कमर, पीठ, जानु, जङ्घा और सन्धिस्थान-गत वातकी पीडा तत्काल नाश होती है। इस तैलको सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेकी इच्छासे हारीतमुनिने वर्णन किया है। जिसको सैकडों बडे बडे योग्य चिकित्सकोंने त्यागदिया हो ऐसे वातरोगको यह तैल शीघ्र नष्ट करता है । विशेष-कर यह मनुष्योंके कम्पवात और अस्सीप्रकारके वातरोगोंको बहुत शीघ्र दूर करता है ॥ ३१७-३२१ ॥