भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 695 of 1416
Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६३
शतावरको कूटकर निकालाहुआ रस २ प्रस्थ ( १२८ तोले ), तिलका तैल १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), गौका दूध ४ प्रस्थ, अदरखका रस १ प्रस्थ और कल्कके लिये सोया, देवदारु, बालछड, भूरिछरीला, खिरेंटी, लाल चन्दन, तगर, कूठ, इलायची, शालपर्णी, रायसन, असगन्ध, वराहक्रान्ता, उसवा, अनन्तमूल, पृश्निपर्णी वच, अण्डकी जड, सेंधानमक और सोंठ इन सब औषधियोंको समान भाग मिश्रित १६ तोले लेकर सबको यथाविधि एकत्र करके उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे ॥ ३०६-३०९ ॥
कौब्ज्येन वामना ये च पङ्गुपादाश्च ये नराः ।
महावातेन ये भग्ना अङ्गसङ्कुटिताश्च ये ॥ ३१० ॥
तेषां हितमिदं तैलं सन्धिवाते च शस्यते ।
येषां शुष्यति चैकाङ्गं गतिर्येषां च विह्वला ॥ ३११ ॥
क्षीणेन्द्रिया नष्टशुक्रा जरया जर्जरीकृताः ।
अमेधसश्च बधिरास्तेषामपि परं हितम् ॥ ३१२ ॥
मासमेकं पिबेद्यस्तु यौवनस्थः पुनर्भवेत् ।
सिद्धार्थकमिति ख्यातं नरनारीहिताय च ॥ ३१३ ॥
यह तेल-कुब्जताके होनेसे जो बौने होगये हैं, जो लँगडे हैं, जिनके भयङ्कर वातव्याधिसे शरीर नष्ट होगये हैं या जिनके अङ्ग कुचलगये हैं ऐसे मनुष्योंको अत्यन्त हितकारी है सन्धिगत वातमें एवं जिनका एक अङ्ग सूख गया है, जिनकी गति विह्वल है, जो क्षीण इन्द्रिय, क्षीणवीर्य मनुष्य, वृद्धतासे जर्जर होगये हैं देह जिनके ऐसे वृद्ध, बुद्धिहीन और बहरे जो मनुष्य हैं उनके लिये भी यह अत्यन्त उपयोगी है । जो एक महीनेतक इस तेलको निरन्तर पान करे तो वृद्ध मनुष्य फिर युवा होजाता है । यह सिद्धार्थक नामक तैल स्त्री और पुरुषोंके कल्याणके लिये प्रसिद्ध है ॥ ३१०-३१३ ॥
नकुलतैल ।
मधुकं जीरकं रास्ना सैन्धव शतपुष्पिका ।
यमानीमरीचं कुष्ठं विडङ्गं गजपिप्पली ॥ ३१४ ॥
सौवर्चलं चाजमोदा बला षड्ग्रन्थिका तथा ।
ग्रन्थिकं शैलजं मांसी कर्षमेषां पृथक्पृथक् ॥ ३१५ ॥