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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 671 of 1416

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Page 671

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३९

खल्वे द्रवेणैव कुमारिकाया गुञ्जाप्रमाणां वटिकां प्रकुर्यात् ।
त्रैलोक्यचिन्तामणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥
हन्त्यामयान् योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः ।
अस्य प्रसादेन गदानशेषान् जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥

हीरा, सुवर्ण, मोती और लोहा इन चारोंकी भस्म एक एक तोला, अभ्रकभस्म चार तोले और रससिन्दूर चार तोले इन सबको लोहेके अथवा पत्थरके खरलमें एकत्र करके घीकुँआरके रसके साथ उत्तम प्रकारसे खरल कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस त्रैलोक्यचिन्तामणिनामक रसको प्रतिदिन प्रातःकाल पार्वती और सूर्यनारायणका यथाविधि पूजन कर सेवन करे । सैकड़ों प्रयोगोंके करनेसे भी जो दूर न हुए हों ऐसे रोगोंको नष्ट करनेके लिये मुनियोंने इस रसको निर्दिष्ट किया है । इसके प्रभावसे मनुष्य सम्पूर्ण रोगों और वृद्धताको जीतकर सुख भोगता है ॥ ४६-४८ ॥

स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः ।
शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥ ४९ ॥
श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते ।
कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ १५० ॥
बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् ।
आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ १५१ ॥

बुद्धिमान् वैद्य इस रसको कफकी तरल अवस्थामें अदरखके रसके साथ, कफके शुष्क होनेपर शहदके साथ, पित्ताधिक्यमें घी और मिश्रीके साथ, कफका प्रकोप होनेपर एवं वायुकी समान अवस्थामें पीपलके चूर्ण और शहदके साथ और प्रमेहरोगमें दूधके साथ सेवन करावे । यह रस बल, वर्ण और अग्निको उत्पन्न करता एवं खाँसी, कफ और वातको दूर करता है । एवं आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक, वृष्य और सब रोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ४९-१५१ ॥

[ “तारशब्देनात्र शुद्धमौक्तिकमेवोच्यते नतु रजतम् ।
सममिति समभागं, चतुर्णां समं मृताभ्रम्, केषाञ्चिन्मते
रससिन्दूरस्थाने स्वर्णसिन्दूरं देयमिति ॥” ]

। “यहाँ तारशब्दसे शुद्ध मोती कहागया है, चाँदी नहीं । ‘समम्’ शब्दसे चारों भस्म समान भाग और चारोंकी बराबर अभ्रक भस्म लेवे । किसी २ के मतमें