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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 670 of 1416

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Page 670
६३८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

द्विक्षारं पञ्चलवणं मर्दितं स्यात्समं समम् ।
ततो निर्गुण्डिकाद्रावैर्मर्दयेद्दिवसत्रयम् ॥ ४० ॥
शुद्धमेतद्विचूर्ण्याथ विषं चास्याष्टमांशतः ।
टङ्कणं विषतुल्यांशं दत्त्वा जम्बीरकद्रवैः ।
भावयेद्दिनमेकं तु रसोऽयं वातकण्टकः ॥ ४१ ॥

हीरा १ भाग, अभ्रक २ भाग, सुवर्ण ३ भाग, तांबा ४ भाग, तीक्ष्णलोह ५ भाग, मुण्डलोह ६ भाग और कालीमिरच ७ भाग इन सब ओषधियोंको एकत्रकर अम्लवर्गकी ओषधियोंके द्वारा ३ दिनतक खरल करे । फिर उसमें सज्जी, जवाखार, पाँचोंनमक ये प्रत्येक समान भाग मिलाकर निर्गुण्डीके रसमें तीनदिन खरल करे । फिर ओषधिको सुखाकर और चूर्ण करके समस्त औषधका आठवाँ भाग शुद्ध मीठा तेलिया और विषकी बराबर सुहागा मिलाकर जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिनतक भावना देवे । इस प्रकार यह वातकण्टकरस सिद्ध होता है ॥ ३९-४१ ॥

दातव्यो वातरोगेषु सन्निपाते विशेषतः ॥ ४२ ॥
द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैर्घृतैर्वा वातरोगिणे ।
निर्गुण्डीमूलचूर्णं तु महिषाक्षं च गुग्गुलुम् ॥ ४३ ॥
समांशं मर्दयेदाज्ये तद्वटी कर्षसम्मिता ।
अनुयोज्या घृतैर्नित्यं स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥ ४४ ॥
मण्डलं नाशयेत्सर्वं वातरोगं विशेषतः ।
सन्निपाते पिबेच्चानु तालमूलीकषायकम् ॥ ४५ ॥

सर्वप्रकारके वातरोगोंमें यह रस दो दो रत्ती प्रमाण लेकर अदरखके रस अथवा गोघृतके साथ वातरोगीको सेवन करावे । औषध सेवन करनेके पश्चात् निर्गुण्डीकी जडका चूर्ण और भैंसिया गूगल इनको समान भाग लेकर घीमें खरल करके एक एक कर्षकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली घृतके साथ मिलाकर सेवन करनी चाहिये और इसपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थोंका भोजन करे । इसके द्वारा शरीरके चकत्ते और सम्पूर्ण वातरोग दूर होते हैं । सन्निपातमें इस रसको सेवन कर ऊपरसे मुसलीका क्वाथ पान करे ॥ ४२-४५ ॥

त्रैलोक्यचिन्तामणिरस ।

हीरं सुवर्णं सुमृतं च तारमेषां समं तीक्ष्णरजश्चतुर्णाम् ।
समं मृताभ्रं रससिन्दुरं च निष्पिष्टतीक्ष्णस्य तथाऽश्मनो वा ॥