भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ६०८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अपस्मार- |
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आश्वासन देना, डराना, बांधना, भय, दान, हर्ष आदिके काम, धूप, इन्द्रियरोगके भुलानेवाली बातें, सुगन्धित वस्तुओंका प्रलेप, शिरा वेधना, संशमन ओषधियाँ, जलसिञ्चन, आश्चर्यजनक कार्य, धूमपान, बुद्धि, धीरता, सत्त्वगुण ये आत्मज्ञानका वर्णन, तैलकी मालिश, स्नान, स्थिरचित्तसे बैठना, शयन करना, शीतल पदार्थोंका प्रलेप करना, गेहूँ, मूँग, लालशालि धानोंके चावल, धारोष्ण दूध, सौबारका धोया हुआ घी, नैनी घी और पुराना घी, कछुवएका मांस, मरुदेशोत्पन्न पशु-पक्षियोंका मांसरस, रसाला, पुराना पेठा, परवल, ब्राह्मीका शाक, बथुएका शाक, चौलाईका शाक, गदहेका मूत्र, घोडेका मूत्र, वर्षाका जल, हरड, सुवर्णभस्म, नारियल, दाख, कैथ कटहल ये सब उन्मादरोगमें पथ्य हैं ॥ ९२–९५ ॥
उन्मादरोगमें अपथ्य ।
मद्यं विरुद्धाशनमुष्णभोजनं निद्राक्षुधातृट्कृतवेगधारणम् ।
व्यवायमाषाढफलं कठिल्लकं शाकानि पत्रप्रभवाणि सर्वशः ॥
तिक्तानि बिम्बीचभिपक्वसमादिशेदुन्मादरोगोपहतेषुगर्हितम् ॥
मदिरा, विरुद्ध आहार, गरमभोजन, निद्रा, क्षुधा और तृषा इनके वेगको रोकना, स्त्रीप्रसङ्ग, ढाकके बीज, करेला, सर्वप्रकारके पत्रशाक, कडवे पदार्थ और कन्दूरी ये सब पदार्थ उन्मादरोगमें अपथ्य हैं ॥ ९६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यामुन्मादरोगचिकित्सा ।
अपस्माररोगकी चिकित्सा ।
वातिकं वस्तिभिः प्रायः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।
श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥ १ ॥
वातज अपस्मारको प्रायः वस्तिकर्मके द्वारा, पित्तज अपस्मारको विरेचनसे और कफजनित अपस्मार रोगको प्रायः वमनके द्वारा शमन करे ॥ १ ॥
पुष्योद्धतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम् ।
तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं स्मृतम् ॥ २ ॥
पुष्यनक्षत्रमें कुत्तेके पित्तको निकालकर आँखोंमें आँजनेसे अथवा उसको घृतके साथ मिलाकर धूनी देनेसे अपस्मार रोग नष्ट होता है ॥ २ ॥