भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context-६०६ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद -
मेहे मूत्रग्रहे चैव ज्वरे जीर्णे च शस्यते ।
वृष्यं बलकरं हृद्यं वन्ध्यानामपि पुत्रदम् ॥ ८१ ॥
श्रीविन्ध्यवासिपादेन सिद्धिदं समुदीरितम् ।
शिवाघृतमिदं नाम्ना शिवायोन्मादिनां सदा ॥ ८२ ॥
इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह घृत देवता, असुर, ग्रहादिकी बाधासे उत्पन्न हुए उन्माद, राक्षसपीडा, गन्धर्वबाधा, पितर, भूत, पिशाच और नागोंके ग्रसनेसे उत्पन्न हुए उन्माद या जाङ्गली जीवोंका मांस खानेसे उत्पन्न हुए विकार, यक्षबाधा, भयसे अत्यन्त आक्रान्त होनेपर एवं सर्वप्रकारके वातरोग, सर्व प्रकारके अपस्मार, उरःक्षत, खाँसी, पीनस, मदात्यय, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र और जीर्णज्वर इन सब रोगोंमें हितकारी है । यह घृत अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, बलकारक, हृदयको हितकारी, वन्ध्या-स्त्रियोंको पुत्रदायक और श्रीविन्ध्येश्वरी देवीकी कृपासे सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है । यह शिवानामक घृत उन्मादरोगियोंके लिये सदा कल्याणकारक है ॥७७-८२॥
शिवातैल ।
प्रस्थं शृगालमांसस्य त्यक्त्वा मुखनखादिकम् ।
दशमूलतुलाद्धं च जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ८३ ॥
पादशेषे रसे तस्मिन्क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ।
प्रस्थं च तिलतैलस्य कल्कं दत्त्वा प्रयत्नतः ॥ ८४ ॥
पञ्चमूली वचा कुष्ठं शैलेयं शारिवाद्वयम् ।
धुस्तूरवरुणामूलं घण्टाकी बृहतीद्वयम् ॥ ८५ ॥
चित्रकं पिप्पलीमूलं मधुकं सैन्धवं बला ।
शतपुष्पा देवदारु रास्ना वारणपिप्पली ॥ ८६ ॥
मुस्ता शठी च लाक्षा च ( प्र ) सारणी रक्तचन्दनम् ।
एषां च कार्षिकं भागं शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ८७ ॥
मुख और नखादि रहित गीदडका मांस ( पोटलीमें बँधा हुआ ) एक प्रस्थ और दशमूल समान भाग मिश्रित ५० पल लेकर सबको एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस काढेमें गोदुग्ध चार प्रस्थ, तिलका तैल एक प्रस्थ एवं बेलकी छाल, सोना-पाठेकी छाल, कम्भारी, पाढर, अरणी, वच, कूठ, भूरिछरीला, उसवा,