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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 618 of 1416

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Page 618
५८६भैषज्यरत्नावली ।- मदात्यय-

कालानमक, सोंठ, मिरच और पीपल इनको अष्टमांश जलमें पीसकर मूँगके यूषके साथ जीर्णमद्यवाले रोगीको सेवन करनेसे वातजमदात्ययविकार दूर होय ॥२॥

मुद्गयूषः सितायुक्तः स्वादुर्वा पैशितो रसः ।
पित्तपानात्यये योज्यः सर्वतश्च क्रिया हिमाः ॥ ३ ॥

पित्तज मदात्ययरोगमें मिश्री मिलाकर मूँगका यूष और सुस्वादु मांसरस सेवन करना चाहिये और सर्व प्रकारके शीतल उपचार करने चाहिये ॥ ३ ॥

पानात्यये कफोद्भूते लङ्घनं च यथाबलम् ।
दीपनीयौषधोपेतं पिबेन्मद्यं समाहितः ॥ ४ ॥

कफोत्पन्न पानात्यय रोगमें रोगीके बलानुसार लंघन कराने चाहिये और दीपनीयगणकी औषधियोंके चूर्णके साथ यथोचित मात्रासे मद्यपान कराना ॥ ४ ॥

सर्वजे सर्वमेवेदं प्रयोक्तव्यं चिकित्सितम् ।
आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिः शमं याति मदात्ययः ॥ ५॥

त्रिदोषजन्य मदात्ययरोगमें पूर्वोक्त वातादि तीनों दोषोंकी मिलीहुई चिकित्सा करनी चाहिये। इन सम्पूर्ण क्रियाओंके द्वारा चिकित्सा करनेसे त्रिदोषज मदात्ययरोग शमन होता है ॥ ५ ॥

सच्छर्दिमूर्च्छातीसारं मदं पूगफलोद्भवम् ।
सद्यः प्रशमयेत्पीतमातृप्तेर्वारि शीतलम् ॥ ६ ॥

अत्यन्त सुपारी खानेसे उत्पन्न हुई वमन, मूर्च्छा और अतिसार मदात्ययमें तृप्तिपूर्वक शितल जल पान करनेसे शीघ्र शान्ति होती है ॥ ६ ॥

वन्यकरीषघ्राणाज्जलपानाल्लवणभक्षणादपि च ।
शाम्यति पूगफलमदश्चूर्णरुजी शर्कराकवलात् ॥ ७ ॥

सुखे हुई आरने उपलोंको सूँघनेसे, अत्यन्त जल पीनेसे अथवा नमक खानेसें या सख्त सुपारीके भक्षण करनेसे उत्पन्न हुआ मदात्ययरोग नष्ट होता है। चूना खानेसे मुख या जीभमें छाले होजानेपर खाँडके कवल धारण करना ॥ ७ ॥

सगुडः कूष्माण्डरसः शमयति मदमाशु मदनकोद्रवजम् ।
धुस्तूरजं च दुग्धं सशर्करं पानयोगेन ॥ ८ ॥

मैनफल और कोदों अन्नके खानेसे उत्पन्न हुआ मद पेठेके रसमें गुड मिलाकर खानेसे शीघ्र शमन होता है और खाँड मिलाकर दूधको पीनेसे धतूरेका मद शान्त होता है ॥ ८ ॥