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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 617 of 1416

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Page 617

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५८६

काटना, नाक और मुँहको बन्द करके श्वासको रोकना, विरेचन, वमन और लंघन कराना, क्रोध, भय, कष्टजनक शय्यापर शयन कराना, विचित्र और मनोहर (कथा) कहानी सुनाना, छाया, वर्षाका जल, सौबार धोयाहुआ घी, मृदु और कडवे पदार्थ, खीलोंका माँड, पुराने जौ, लालशालिधानोंके चावल, सौ वर्षका पुराना घी, मूँग और मटरका यूष, जाङ्गलदेशोत्पन्न जीवोंका मांंसरस, राग खाण्डवयूष, गौका दूध मिश्री, पुराना पेठा, परवल, केलेका मोचा, हरड, अनार, नारियल, महुयेके फूल, चौलाईका शाक, पोईका शाक, लघु (हल्के) अन्नोंका भोजन, स्वच्छ जल, सफेद चन्दन, कपूर सुवासित जल, कपूर, जोरसे चिल्लाना, अद्भुत वस्तुओंका दर्शन, अत्यन्त तीव्र स्वरसे गाना, उत्कट स्वरवाले बाजे बजाना, परिश्रम, चिन्ता, आत्मज्ञान और धैर्य ये सब मूर्च्छितरोगीको हितकर हैं ॥ २०-२५ ॥

मूर्च्छारोगमें अपथ्य ।

ताम्बूलं पत्रशाकानि दन्तघर्षणमातपम् ।
विरुद्धान्यन्नपानानि व्यवायं स्वेदनं कटुम् ॥
तृड्निद्रयोर्वेगरोधं तक्रं मूर्च्छामयी त्यजेत् ॥ २६ ॥

ताम्बूल (पान), पत्रवाले शाक, दन्तधावन, धूपका सेवन, विरुद्ध अन्नपान, स्त्रीप्रसङ्ग, स्वेदक्रिया, चरपरे द्रव्य, तृषा और निद्राके वेग को रोकना और मठेका सेवन ये सब मूर्च्छारोगीको त्यागदेने चाहिये ॥ २६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां मूर्च्छारोग-चिकित्सा ।


मदात्ययरोग-चिकित्सा ।

मन्थः खर्जूरमृद्वीकावृक्षाम्लाम्लीकदाडिमैः ।
परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत् ॥ १ ॥

खीलोंका चूर्ण, खजूर, दाख, विषांबिल, इमली, अनार, फालसे और आमले इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर सेवन करनेसे मद्यपानजनित विकार नष्ट होता है ॥ १ ॥

मुद्गं सौवर्चलव्योषयुक्तं किञ्चिज्जलान्वितम् ।
जीर्णमद्याय दातव्यं वातपानात्ययापहम् ॥ २ ॥