भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७९
अधिक जल पान करनेसे अथवा प्यास लगनेपर बिलकुल जल न पीनेसे अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिये बुद्धिमान् प्राणरक्षाके लिये बारम्बार थोड़ा २ जलपान करे ॥ २१ ॥
रसादिचूर्ण ।
रसगन्धककर्पूरैः शैलोशीरमरीचकैः ।
ससितैः क्रमवृद्धैश्च सूक्ष्मं कृत्वा त्वहर्मुखे ॥ २२ ॥
त्रिगुञ्जामप्रमितं खादेत्पिबेत्पर्युषिताम्बु च ।
भृशं तृषांनिहन्त्येवमश्विभ्यां च प्रकाशितम् ॥ २३ ॥
शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक दो तोले, कपूर ३ तोले, शिलाजीत ४ तोले, खस ५ तोले, काली मिरचें ६ तोले और मिश्री ७ तोले लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल तीन तीन रत्ती प्रमाण भक्षण करे और ऊपरसे बासी जल पान करे तो यह अत्यन्त बढी हुई तृषाको शीघ्र शमन करताहै। इसको अश्विनीकुमारोंने प्रकाशित कियाहै ॥ २२ ॥ २३ ॥
महोदधिरस ।
ताम्रं वक्तिकया वङ्गं सूतं तालं सतुत्थकम् ।
वटाङ्कुररसैर्भाव्यं तृष्णाहृद्वल्लमात्रतः ॥ २४ ॥
सक्षौद्रमाम्रजम्बूत्थं पिबेत्क्वाथं पलोन्मितम् ॥
सकृष्णा मधुना कुर्याद्गण्डूषान् शीतले स्थितः ॥ २५ ॥
[ “यत्र केवल एव रसस्तत्र भस्मसूतो देयः ॥” ]
ताम्रभस्म, वंगभस्म, रससिन्दूर, हरतालभस्म और शुद्ध तूतिया इन सबको समान भाग लेकर बडके अंकुरोंके रसमें खरलकर लेवे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाणसे सेवन करके ऊपरसे आम और जामुनकी छालके चार तोले काढेको शहद मिलाकर पान करे तो तृषा शान्त होती है। इस औषधको सेवन करनेपर शीतल शय्यापर शयन एवं शहद और पीपलके चूर्णको गण्डूष धारण करना चाहिये । [ जहाँपर केवल रसशब्दही कहा हो वहाँ पारेकी भस्म देनी चाहिये ] २४ ॥ २५॥
तृष्णारोगमें पथ्य ।
शोधनं शमनं निद्रां स्नानं कवलधारणम् ।
जिह्वाधःशिरयोर्दाहो दीपदग्धहरिद्रया ॥ २६ ॥