भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५७७
दूध, ईखका रस, महुएकी मद्य, शहद, सीधुनामक मद्य (शिर्र्का,) गुडका शर्बत, विषाम्बल और अम्लद्रव्योंके रसके द्वारा गण्डूष (कुल्ले) धारण करनेसे तालुशोष दूर होता है ॥ ९ ॥
आम्रजम्बूकषायं वा पिबेन्माक्षिकसंयुतम् ।
छर्दिं सर्वां प्रणुदति तृष्णां चैवापकर्षति ॥ १० ॥
आम अथवा जामुनके हरे पत्तोंका क्वाथ बनाकर उसमें शहद मिलाकर पान करनेसे सब प्रकारकी वमन और तृषा नष्ट होती है ॥ १० ॥
वटशुङ्गसितालोध्रदाडिमं मधुकं मधु ।
पिबेत्तण्डुलतोयेन छर्दितृष्णानिवारणम् ॥ ११ ॥
वडके अंकुर, मिश्री, लोध, अनार, मुलहठी और शहद इन सबको समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे वमन और तृषा निवृत्त होती है ॥ ११ ॥
केशरं मातुलुङ्गस्य सक्षौद्रं दाडिमीयुतम् ।
क्षणमात्रेण दुर्वांरां तृष्णां कवलतो जयेत् ॥
दाहतृष्णाप्रशमनं मधुगण्डूषधारणम् ॥ १२ ॥
बिजौरे नींबूके फूलोंकी केशर, शहद और अनारका रस इनको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर इनका कवल धारण करनेसे क्षणमात्रमेंही दुःसाध्य तृषा तथा शहदके गण्डूष धारण करनेसे दाह और तृषा शान्त होती है ॥ १२ ॥
असञ्चार्य्या तु या मात्रा गण्डूषे सा प्रकीर्तिता ।
सुखं सञ्चार्य्यते या तु सा मात्रा कवले हिता ॥ १३ ॥
मुखमें इतनी औषधि भरले कि जो मुखमें चलायी न जा सके उसको गण्डूष कहते हैं और मुखमें भरी हुई औषधि जो अच्छे प्रकारसे मुखमें चलाई जा सके उसको कवल कहते हैं ॥ १३ ॥
वटशुङ्गामयक्षौद्रलाजनीलोत्पलैर्दृढा ।
गुडिका वदनन्यस्ता क्षिप्रं तृष्णामुदस्यति ॥ १४ ॥
वडके अंकुर, कूठ, मधु, खीलें और नीलकमल इन सबको समभाग लेकर एकत्र खरल करके गोली बनालेवे। इन गोलियोंको मुखमें धारण करनेसे तत्काल तृषा निवारण होती है ॥ १४ ॥
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