भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context५७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ तृषा-
आधपाव खीलोंको एक सेर गरम जलमें रात्रिमें भिजोकर दूसरे दिन प्रातःकाल छानकर उसमें शहद, गुड, कुम्हेरका चूर्ण और मिश्री प्रत्येक छःछः मासे मिलाकर थोडा थोडा बारम्बार पान करनेसे पिपासा शान्त होती है ॥ ३ ॥
बिल्वाढकीधातकिपञ्चकोलदर्भेषु सिद्धं कफजां निहन्ति ।
हितं भवेच्छर्दनमेव चात्र तप्तेन निम्बप्रसवोदकेन ॥ ४ ॥
बेलगिरी, अरहरके पत्ते धायके फूल, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ और कुशकी जड इनका क्वाथ बनाकर पान करनेसे कफजनित तृषा शान्त होती है । अथवा कफकी तृषामें नीमकी छाल, नीमके फूल, अथवा नीमके पत्तोंका गरम काढा पिलाकर वमन करानेसे विशेष उपकार होता है ॥ ४ ॥
क्षतोत्थितां रुग्विनिवारणेन जयेद्रसानामसृजश्च पानैः ।
क्षयोत्थितां क्षीरजलं निहन्यान्मांसोदकं वाथ मधूदकं वा ५॥
क्षतके कारण उत्पन्न हुई तृषामें क्षतनिवारक औषधियोंका सेवन, मांसरस और कृष्णमृग, खरगोश आदिका मन्दोष्ण रक्त पान कराना चाहिये और क्षय जनित तृषामें दूध मिला हुआ जल ( लस्सी ) या मांसरस अथवा शहद मिला हुआ वर्षाका जल पान कराना चाहिये ॥ ५ ॥
गुर्वन्नजामुल्लिखनर्जयेत्तु क्षयाहते सर्वकृतां च तृष्णाम् ॥६॥
क्षयकी तृषा छोडकर गुरुपाकी पदार्थोंके खानेसे उत्पन्न हुई तृषाको और अन्य सर्व प्रकारकी तृषाओंको वमन कराकर दूर करना चाहिये ॥ ६ ॥
अतिरूक्षदुर्बलानां तृषां शमयेन्नृणामिहाशु पयः ।
छागो वा घृतभृष्टः शीतो मधुरो रसो हृद्यः ॥ ७॥
अत्यन्त रूक्ष और दुर्बल देहवाले मनुष्योंके तृषारोगमें बकरीका दूध या घीमें भुना हुआ बकरेके मांसका शीतल यूष और मधुररस ये सब हितकारी और हृदयको प्रिय हैं ॥ ७ ॥
गोस्तनेक्षुरसक्षीरयष्टीमधुमधूत्पलैः ।
नियतं नस्यतः पीतैस्तृष्णा शाम्यति दारुणा ॥ ८ ॥
दाखोंका रस या क्वाथ, ईखका रस, दूध मुलहठीका क्वाथ, शहद और कुमोदनी ( नीलोफर ) के फूलोंका रस इनको नासिकाके द्वारा पान करनेसे या इनका नस्य लेनेसे दारुण तृषा शान्त होती है ॥ ८ ॥
क्षीरेक्षुरसमाध्वीकैः क्षौद्रसीधुगुडोदकैः ।
वृक्षाम्लाम्लैश्च गण्डूषास्तालुशोषनिवारणाः ॥ ९ ॥