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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 575 of 1416

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Page 575

चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ५४३

श्वासारीलौह प्रबलश्वास, पाँचों प्रकारकी खाँसी, दारुण, रक्तपित्त, एकदोषज, द्विदोषज और त्रिदोषज रोगोंको इस प्रकार निस्सन्देह नष्ट कर देता है, जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है ॥ ३३-३७ ॥

पिप्पल्याद्य लौह ।

पिप्पल्यामलकी द्राक्षा कोलास्थिमधुशर्करा ।
विडङ्गपुष्करैर्युक्तं लौहं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ ३८ ॥
हिक्कां छर्दिं महाश्वासं त्रिरात्रेण न संशयः ।
सर्वचूर्णसमं लौहं मधु (यष्टिमधु, पुष्करं) पुष्करमूलकम्

पीपल, आमले, दाख, बेरकी गुठलीकी गिरी, मुलहठी, मिश्री, वायविडङ्ग और पोहकरमूल इन प्रत्येकका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णके बराबर लोहभस्म इन सबको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे दुस्तर हिक्का, वमन और महाश्वासरोग तीन-दिनमें ही निश्चय दूर होता है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥

श्वासकुठाररस ।

रसं गन्धं विषं टङ्कं शिलोषणकटुत्रिकम् ।
सर्वं सम्मद्य दातव्यो रसः श्वासकुठारकः ॥
वातश्लेष्मसमुद्भूतं कासं श्वासं स्वरक्षयम् ॥ ४० ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मीठा तेलिया, सुहागा, मैनसिल, सोंठ और पीपल ये प्रत्येक एक एक तोला और मिरच २ तोले लेवे। सबको एकत्र जलके साथ खरल करके एक एक रत्ती प्रमाण लेकर अदरखके रस और शहदके साथ सेवन करावे । यह श्वासकुठाररस वात और कफसे उत्पन्नहुई खाँसी, श्वास और स्वरभंग-रोगको दूर करता है ॥ ४० ॥

महाश्वासकुठार रस ।

रस गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं समनःशिलम् ।
एतानि समभागानि मरिचं चाष्ट टङ्कणात् ॥ ४१ ॥
टङ्कषट्कं द्विकटुकं खल्ले कृत्वा विचूर्णयेत् ।
रसः श्वासकुठारोऽयं विषमश्वासकासजित् ॥ ४२ ॥
प्रतिश्यायं च यक्ष्माणमेकादशविधं क्षयम् ।
हृद्रोगं पार्श्वशूलं च स्वरभेदं च दारुणम् ॥ ४३ ॥