भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ५४२ | भैषज्यरत्नावली । | [ हिक्काश्वास - |
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एकशश्च पलिकैरैरिह सत्त्वैर्मर्दितं जयति तद्गुरुहिक्काम् ।
श्वासकासमुदरं चिरमेहान् पाण्डुगुल्मयमकृतं गलरोगम् ॥ ३१
शोथमोहनयनास्यजरोगं यक्ष्मपीनसगदं बलसादम् ।
गण्डमुण्डलवमिभ्रमिदाहं प्लीहशूलविषमज्वरकृच्छ्रम् ॥
हन्ति वातकफपित्तमशेषं डामरेश्वरमिदं महदभ्रम् ॥ ३२ ॥
कृष्ण अभ्रककी भस्मको चार तोले लेकर ब्रह्मदण्डीकी छाल, धूतूरेके पत्ते, गिलोय, अडूसा, कसौंदी, बकायन, चव्य, पीपलामूल और चीतेकी जडकी छाल इन प्रत्येकको चार चार तोले रसके साथ क्रमसे खरल करलेवे। यह डामरेश्वराभ्रक-प्रबल हिक्का, श्वास, खाँसी, उदरविकार, पुराना प्रमेह, पाण्डु, गुल्म, यकृत, गलेके रोग, सूजन, मूर्च्छा, नेत्र और मुखके रोग, राजयक्ष्मा, पीनस, बलक्षय, गण्डरोग, शिरोरोग, वमन, भ्रम, दाह, प्लीहा, शूल, विषमज्वर, मूत्रकृच्छ्र, एवं वायु, कफ और पित्तजन्य सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करता है ॥ ३०–३२ ॥
महाश्वासारिलौह ।
कर्षद्वयं लौहचूर्णं कर्षाध्राभ्रकमेव च ।
सिताकर्षद्वयं चैव मधु कर्षद्वयं तथा ॥ ३३ ॥
त्रिफला मधुकं द्राक्षा कणा कोलास्थिवंशजा ।
तालीसपत्रं वैडङ्गमेला पुष्करकेशरम् ॥ ३४ ॥
एतानि श्लक्ष्णचूर्णानि कर्षार्द्धं च समांशिकम् ।
लौहे च लौहदण्डेन मर्दयेत्प्रहरद्वयम् ॥ ३५ ॥
ततो मात्रां लिहेत्क्षौद्रैर्बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ।
इद श्वासारीलौहं च महाश्वास विनाशयेत् ॥ ३६ ॥
कासं पञ्चविधं चैव रक्तपित्तं सुदारुणम् ।
एकजं द्वन्द्वजं चैव तथैव सान्निपातिकम् ॥
निहन्ति नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३७ ॥
लोहभस्म दो कर्ष, अभ्रकभस्म आधाकर्ष, मिश्री दो कर्ष, शहद दो कर्ष, त्रिफला, मुलहठी, दाख, पीपल, बेरकी गुठलीकी गिरी, वंशलोचन, तालीसपत्र, वायविडङ्ग, छोटी इलायची, पोहकरमूल और नागकेशर इन सबको आधा आधा कर्ष लेकर बारीक चूर्ण करके लोहेके पात्रमें लोहेके दण्डसे दो प्रहरतक खरल करे। फिर दोषोंका बलाबल विचारकर इसकी यथोचितमात्रा शहदके साथ सेवन करे। यह