भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 564 of 1416
Read in context| ५३२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कासरोग- |
|---|
कासहृत्पार्श्वशूलघ्नं हिक्काश्वासनिवारणम् ।
कल्कं षट्पलमेवात्र ग्राहयन्ति भिषग्वराः ॥ ५३ ॥
दशमूलके चार प्रस्थ क्वाथमें गौका घी एक प्रस्थ, एवं जवाखार, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता और सोंठ इन प्रत्येकका कल्क चार चार तोले डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको पकावे । यह घृत पाँचों प्रकारकी खाँसी, हृदयरोग, पसलीका शूल, हिचकी और श्वासरोगको दूर करता है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
छागलाद्यघृत ।
आजमांसं तुलामानं वासकस्य पलं शतम् ।
अश्वगन्धापलशतं कटाहे समधिक्षिपेत् ॥ ५४ ॥
जलद्रोणे पृथक् पक्त्वा चतुर्थांशावशेषितैः ।
कषायैर्विपचेद्द्रव्यं प्रस्थद्वयमितं घृतम् ॥ ५५ ॥
छागक्षीरं घृतसमं दद्यात्कल्कानि यानि च ।
वक्ष्याम्यतः परं तानि सर्वाणि शृणु यत्नतः ॥ ५६ ॥
नपुंसक बकरेका मांस १०० पल, अडूसेकी छाल १०० पल और असगन्ध १०० पल इनको पृथक् पृथक् कढायमें डालकर बत्तीस सेर जलमें पकावे, जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब नीचे उतारकर छान लेवे । फिर उस क्वाथमें गौका घी २ प्रस्थ और बकरीका दूध २ प्रस्थ डालदेवे ॥ ५४ ५६ ॥
अष्टवर्गं पञ्चमूली चातुर्जातं शतावरी ।
त्रिकटु त्रिफला यष्टी विदारी शाल्मली वचा ॥ ५७ ॥
शङ्खपुष्पी सुधामूली मुसली चविका तथा ।
कपिकच्छुकबीजं च दीप्या खदिरजीरकौ ॥ ५८ ॥
सूक्ष्मैला मेथिका भार्ङ्गी प्रत्येकं शुक्तिमानतः ।
संगृह्य साधयेत्सर्पिः शनैर्मृद्वग्निना भिषक् ॥ ५९ ॥
एवं कल्ककी ओषधियाँ ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, शालपर्णी, पृष्टपर्णी, बडी कटेरी, कटेरी, गोखुरू, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, शतावरी, त्रिकुटा त्रिफला, मुलहठी, विदारिकन्द, सेमलकी मुसली, वच, शंखपुष्पी, शालममिश्री, मुसली, चव्य, कौंचके बीज, अजवायन, खैर, ज़ीरा, इलायची, मेथी और भारङ्गी इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले डालकर मन्द मन्द अग्निके द्वारा शनैः शनैः घृतको सिद्ध करे ॥ ५७-५९ ॥