भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५३१
कण्टकार्यावलेह ।
कण्टकारीतुलां नीरद्रोणे पक्त्वा कषायकम् ।
पादशेषं गृहीत्वा च तत्र चूर्णानि दापयेत् ॥ १४६ ॥
पृथक् पलांशान्येतानि गुडूची चव्यचित्रकौ ।
मुस्तं कर्कटशृङ्गी च त्र्यूषणं धन्वयासकः ॥ १४७ ॥
भाङ्गी रास्ना शठी चैव शर्करा पलविंशतिः ।
प्रत्येकं च पलान्यष्टौ प्रदद्याद् घृततैल्योः ॥ १४८ ॥
पक्त्वा लेहसमं कृत्वा शीते मधुपलाष्टकम् ।
चतुर्भागं तुगाक्षीर्याः पिप्पल्याश्च चतुःपलम् ॥ १४९ ॥
क्षिप्त्वा निदध्यात्सुदृढे मृन्मये भाजने शुभे ।
लेहोऽयं हन्ति हिक्कार्त्तिकासश्वासमशेषतः ॥ १५० ॥
कटेरीको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उसको उतारकर छान लेवे । फिर उसमें सफेद खांड २० पल डालकर पकावे । पाकके सिद्ध होजानेपर उसमें गिलोय, चव्य, चीता, नागरमोथा, काकडासिंगी, त्रिकुटा, धमासा, भारंगी, रायसन और कचूर प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले, घी ३२ तोले और तिलका तैल ३२ तोले डालकर पकावे । जब पककर लेहकी समान होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें शहद ३२ तोले, वंशलोचन १६ तोले और पीपल १६ तोले डालकर सबको एकमएक करके मिट्टीके मजबूत और सुन्दर बासनमें भरकर रखदेवे । यह अवलेह सेवन करतेही हिचकी, सर्वप्रकारकी खांसी और श्वासरोगको नष्ट करता है ॥ १४६–१५० ॥
कण्टकारीघृत ।
घृतं रास्नाबलाव्योषश्वदंष्ट्राकल्कपाचितम् ।
कण्टकारीरसे सर्पिः पञ्चकासनिषूदनम् ॥ १५१ ॥
रायसन, खिरैंटी, सोंठ, मिरच, पीपल और गोखुरू इनके समान भाग मिश्रित एक सेर कल्क और कटेरीके १६ सेर क्वाथके द्वारा ४ सेर घृतको सिद्ध करे । यह घृत पाँचों प्रकारकी खाँसीको दूर करता है ॥ १५१ ॥
दशमूलषट्पलक घृत ।
दशमूलीचतुःप्रस्थे रसे प्रस्थोन्मितं हविः ।
सक्षारैः पञ्चकोलैस्तु कल्कितं साधु साधितम् ॥१५२॥