भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ५२२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कासरोग- |
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नारिकेलजलेनैव भक्ष्योऽयं च रसायनः ।
क्षीरानुपानाद् वृष्योऽयं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ९५ ॥
यह सुप्रसिद्ध तरुणानन्दनामक रस अत्यन्त उग्र राजयक्ष्मा, प्रबल क्षय, घोर उरःक्षत, पाँच प्रकारकी खाँसी, श्वास, स्वरभङ्ग, अरुचि, कामला, पाण्डु, प्लीहा, हलीमक, पुराना ज्वर, तृषा, गुल्म, आमजन्य संग्रहणी, अतिसार, सूजन, कुष्ठ, भगन्दर आदि समस्त व्याधियोंको नाश करता है। एवं श्रेष्ठ रसायन, वीर्यवर्द्धक, नेत्रहितकारी और पुष्टिकर है। इसके सेवन करनेसे मनुष्य हजारों स्त्रियोंके साथ भोग करे, किन्तु फिर भी वीर्य, बुद्धि और बलका क्षय नहीं होता, दो मासतक निरन्तर सेवन करनेसे यह रस सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करदेता है । शुक्रको बढाता और ज्वरको दूर करता है। इस रसायनको नारियलके जलके साथ सेवन करना चाहिये और दूधके साथ सेवन करनेसे यह अत्यन्त वृष्य होजाता है। इसपर कुछ परहेज नहीं करना चाहिये ॥ ८९-९५ ॥
समशर्करलौह ।
लवङ्गं कट्फलं कुष्ठं यमानी त्र्यूषणं तथा ।
चित्रकं पिप्पलीमूलं वासकं कण्ठकारिका ॥ ९६ ॥
चव्यं कर्कटशृङ्गी च चातुर्जातं हरीतकी ।
शठी कक्कोलंक मुस्तं लौहमभ्रं यवाग्रजम् ॥ ९७ ॥
सर्वं प्रतिसमं चूर्णं तावच्छर्करयाऽन्वितम् ।
सर्वमेकीकृतं चूर्णं स्थापयेत्स्निग्धभाजने ॥ ९८ ॥
निहन्ति सर्वजं कास वातश्लेष्मसमुद्भवम् ।
क्षयकास रक्तपित्तं श्वासमाशु विनाशयेत् ॥
क्षीणस्य पुष्टिजननं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ ९९ ॥
लौंग, कायफल, कूठ, अजवायन, सोंठ, मिरच, पीपल, चीतेकी जड, पीपलामूल, अडूसा, कटेरी, चव्य, काकडासिंगी, दारचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नाग-केशर, हरड, कचूर, कंकोल, नागरमोथा, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, जवाखार इन सबका चूर्ण समान भाग और सब चूर्णकी बराबर मिश्री मिलाकर खूब बारीक पीसकर घीके चिकने बर्त्तनमें भरकर रखदेवे। यह लौह वातकफजन्य खाँसी और क्षय आदि सर्व प्रकारके उपद्रवोंसे उत्पन्न हुई खाँसी, रक्तपित्त और श्वासको शीघ्र नष्ट करता है । एवं क्षीण ह्वाले मनुष्यकी पुष्टि करता तथा बल, वर्ण और जठ-राग्निकी वृद्धि करता है ॥ ९६-९९ ॥