भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०७
कासरोगकी चिकित्सा ।
वास्तुको वायसीशाकं मूलकं सुनिषण्णकम् ।
स्नेहास्तैलादयो भक्ष्याः क्षीरेक्षुरसगौडिकाः ॥ १ ॥
दध्यारनालाम्लफलं प्रसन्नापानमेव च ।
प्रशस्यते वातकासे स्वाद्वम्ललवणानि च ॥ २ ॥
ग्राम्यानूपोदकैः शालियवगोधूमषष्टिकान् ।
रसैर्माषात्मगुप्तानां यूषैर्वा भोजयेद्धितान् ॥ ३ ॥
बथुआ, मकोय, मूली और शिरियारीका शाक, घृत, तैलादि स्नेह पदार्थ, दूध, ईखका रस, गुडके बने पदार्थ, दही, काँजी, खट्टे फल, प्रसन्ना नामक मदिरा, मधुर अम्ल और नमकीन पदार्थ एवं ग्राम्य, आनूप और जलचरजीवोंका मांंसरस वा यूष, शालिधानोंके चावल, जौ, गेहूं, सांठीके चावलोंका भात, उडद और कौंचके बीजोंके यूषके साथ हितकर पदार्थोंको वातज कासरोगमें भोजन करना हितकर है ॥ १–३ ॥
शठीशृङ्गीकणाभार्गीगुडवारिद्यासकैः ।
सतैलैर्वातकासघ्नो लेहोऽयमपराजितः ॥ ४ ॥
कचूर, काकडासिंगी, पीपल, भारङ्गी, पुराना गुड, नागरमोथा और धमासा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके सरसोंके तैलके साथ खरल करके सेवन करनेसे वातकी खाँसी नष्ट होती है ॥ ४ ॥
पित्तकासे तनुकफे त्रिवृतां मधुरैर्युताम् ।
दद्याद्धनकफे तिक्तैर्विरेकार्थं युतां भिषक् ॥ ५ ॥
पित्तकी खाँसीमें—कफकी तरलता और कोष्ठबद्धता हो तो रोगीको विरेचन करानेके लिये खाँड या मिश्री आदि मधुर पदार्थोंके साथ निसोतका चूर्ण वा क्वाथ और कफके गाढे होनेपर तिक्त पदार्थोंके रसके साथ निसोतका चूर्ण या क्वाथ सेवन कराना चाहिये ॥ ४ ॥
मधुरैर्जाङ्गलसैः श्यामाकयवकोद्रवाः ।
मुद्गादियूषैः शाकैश्च तिक्तकैर्मात्रया हिताः ॥ ६ ॥