भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context५०६ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-
बकरीका नैनी घी, बकरीका दूध, बकरीका घी, मांसाहारी जीवोंका मांस और जाङ्गल देशमें उत्पन्न हुए पशुपक्षियोंका मांसरस, पके केलेका मोचा, पका कटहल, पके आम, आमले, खजूर, पोहकरमूल, फालसे, नारियल, सहिंजनेकी फली, बेर, नवीनताडका फल, दाख, सौंफ, सैंधानमक, बिसौंटेके पत्ते, गौ और भैंसका घी, बकरियोंके बीचमें शयन और बकरीके मल मूत्रका प्रलेप, मत्स्याण्डिका, मिश्री, शिखरन, मद्य, रसाला, कपूर, कस्तूरी, श्वेतचन्दन और सुगन्धित तैलादि द्रव्योंकी शरीरपर अनुलेपन, स्नान, सुन्दर वेशरचना, जलमें गोता लगाकर स्नान करना, ऊंची अट्टालिकाओंमें निवास, पुष्पमालायें पहरना, कामकथा, मन्द-सुगन्ध वायुका सेवन, चन्द्रमाकी निर्मल चाँदनी, सुन्दर सुन्दर गाने गीत और नृत्य देखना, मोती और मणियोंके निर्मित भूषण धारण करना, यज्ञ करना, दान देना, देवता और ब्राह्मणोंका एवं पुण्य पुरुषोंका पूजन, सम्मान आदि ये सब क्रियायें करनी चाहिये ॥ २६-२३० ॥
यक्ष्मारोगमें अपथ्य ।
विरेचनं वेगविधारणानि श्रमं स्त्रियं स्वेदनमञ्जनं च ।
प्रजागरं साहसकर्म्मसेवा रूक्षान्नपानं विषमाशनं च ॥ ३१ ॥
ताम्बूलकालिङ्गकुलत्थमाषरसोनवंशांकुररामठानि ।
अम्लानि तिक्तानि कषायकाणि कटूनि सर्वाणि च पत्रशाकम् ।
क्षारान्विरुद्धान्यशनानि शिम्बी कर्कोटकं चापि विदाहि सर्वम् ।
कठिल्लकं कृष्णमपि क्षयेषु विवर्जयेत्सन्ततमप्रमत्तः ॥ ३३ ॥
वृन्ताकं कारवेल्लं च तैलं बिल्व च राजिकाम् ।
व्यायामं च दिवानिद्रां क्षयी कोपं विवर्जयेत् ॥ ३४॥
विरेचन कराना, मल मूत्रादिके वेगोंका रोकना, अधिक परिश्रम, अत्यन्त मैथुन, स्वेद देना, नेत्रोंमें अँजन लगाना, रात्रिमें जागना, साहसके कार्य करना, रूक्ष अन्नपान, विषम भोजन, पान, तरबूज, मटर, उड़द, लहसुन, बाँसके अंकुरोंका शाक, हींग, खट्टे-कड़वे-कसैले-चरपरे पदार्थ, सम्पूर्ण पत्तोंवाले शाक, क्षारपदार्थ, विरुद्ध भोजन, सेमकी फली, ककोड़ा, समस्त दाहकारक पदार्थ, काली तुलसी, बैंगन, करेला, तैल, बेल, सरसों, व्यायाम, दिनमें सोना और क्रोध ये सब क्षयरोगीको त्यागदेने चाहिये ॥ २३१-२३४ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां यक्ष्मारोग-चिकित्सा ।