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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 49 of 1416

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Page 49

प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १७


अनुपस्थितदोषाणां वमनं तरुणज्वरे ।
हृद्रोगं श्वासमानाहं मोहं च कुरुते भृशम् ॥ ९२ ॥
तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे ।
मद्योत्थे पैत्तिके वाथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ ९३ ॥
दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं च तत् ।
स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदप्रदं शिवम् ॥ ९४ ॥

वाग्भटमें लिखा है कि—यदि भोजनके पश्चात् तत्काल ज्वर होजाय वा सन्तर्पण ( रसादि धातुओंकी वृद्धि करनेवाले पदार्थोंके ) द्वारा ज्वर होजाय तब वमनके योग्य व्यक्तिको वमन करानी चाहिये । किन्तु, रोगी वमनके योग्य है वा नहीं यह बात पहले ही देखलेनी चाहिये । यदि आमाशयमें स्थित दोषोंमें कफकी अधिकता हो और वमनकी इच्छा होनेसे यह दोष मानो अपने आप ही निकल जायँगे—ऐसा मालूम हो तो क्या नवीन ज्वरवाले, क्या जीर्ण ज्वरवाले वमनयोग्य मनुष्यको वमन करानी चाहिये. किन्तु, नवीन ज्वरमें इन सब लक्षणोंके प्रगट न होनेपर वमन करानेसे हृदयरोग, श्वास, आनाह ( मल-मूत्रका अवरोध ) और अत्यन्त मोह उत्पन्न होता है । वातज्वर कफज्वर और वातकफज्वरमें—गरम जल पान, कराना चाहिये । मद्यपानजन्य ज्वरमें और पित्तज्वरमें—तिक्त ओषधियोंके द्वारा सिद्ध कियेहुए जलको शितिल करके पान करावे । इस प्रकारका जलपान करनेसे अग्निकी वृद्धि, अपक्व रसका परिपाक, ज्वरका नाश, मल-मूत्र और पसीने आदिके द्वारा स्रोतोंकी शुद्धि, बलकी वृद्धि और भोजनमें रुचि होती है एवं पसीना आने लगता है ॥ ९०–९४ ॥

षडङ्गपानीय ।

मुस्तपर्पटकोशीरचन्दनोदीच्यनागरैः ।
शृतशीतं जलं देयं पिपासाज्वरशान्तये ॥ ९५ ॥

तृषा और ज्वरको शान्त करनेके लिये—नागरमोथा, पित्तपापडा, खस, लालचन्दन, सुगन्धवाला और सोंठ सब ओषधियोंको समानभाग मिलीहुई दो तोले लेकर एकत्र कूटकर ४ सेर जलमें पकावे । जब पककर दो सेर जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर शीतल होजानेपर यह जल रोगीको थोड़ा थोड़ा पान करावे ॥ ९५ ॥

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