भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context१६ भैषज्यरत्नावली । चिकित्सा-
हल्कापन मालूम होता है। लंघन अत्यंत हितकर होनेपर भी इस प्रकार कराने चाहिये, जिससे रोगीका शरीर अधिक दुर्बल न होजाय। कारण—आरोग्यताके लिये ही यह सारा क्रियाक्रम है और बल ही उस आरोग्यताका एकमात्र प्रधान कारण है। अर्थात् बलके बिना आरोग्य होना असम्भव है। इसलिये—वातप्रकृतिवाले, क्षुधा तृषासे पीडित, मुखशोष और भ्रमयुक्त मनुष्योंको एवं बालक, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री और दुर्बल मनुष्यको लंघन नहीं कराने चाहिये ॥ ८२ ॥
वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे ।
हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राक्लमे गते ॥ ८६ ॥
स्वेदे जाते रुचौ चापि क्षुत्पिपाससहोदये ।
कृतं लंघनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि ॥ ८७ ॥
पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च ।
क्षुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ॥८८॥
मनसः सम्भ्रमोऽभीक्ष्णमूर्द्धवातस्तमो हृदि ।
देहाग्निबलहानिश्च लंघनेऽतिकृते भवेत् ॥ ८९ ॥
उत्तम प्रकार (जबतक लंघन करानेकी आवश्यकता हो) से लंघन करानेसे मल-मूत्र और अपान वायुका निकलना, शरीरमें लघुता और हृदयका भारीपन दूर होता है। एवं उद्गार (डकार) शुद्ध आती है, कण्ठ और मुख शुद्ध होता है। विशेषकर तन्द्रा और ग्लानि दूर होती है। पसीना आता है, भोजनमें रुचि उत्पन्न होती है। क्षुधा और तृषा उत्पन्न होती हैं, एवं चित्त प्रसन्न होता है। इन सब लक्षणोंके प्रगट होनेपर फिर ज्वरमें लंघन नहीं कराने चाहिये। कारण—अधिक लंघन करानेसे पर्वभेद, सन्धियोंमें तोड़ने सरीखी पीड़ा, अङ्गोंमें पीड़ा, खाँसी, मुखशोष, भूखका न लगना, अरुचि, तृषा, नेत्र और कर्णशक्तिका ह्रास, चित्तमें भ्रम, ऊर्ध्ववात, हृदयमें अन्धकार, शरीर, अग्नि और बलकी हानि होती है ॥ ८६-८९ ॥
सद्यो भुक्तस्य वा जाते ज्वरे सन्तर्पणोत्थिते ।
वमनं वमनार्हस्य शस्तमित्याह वाग्भटः ॥ ९० ॥
कफप्रधानानुत्क्लिष्टान् दोषानामाश्ये स्थितान् ।
बुद्ध्वा ज्वरकरान् काले वम्यानां वमनैर्हरेत् ॥ ९१ ॥