भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४३९
ये मण्डूरवटक पाण्डुरोगियोंको प्राण देनेवाले तथा कुष्ठ, अरुचि, शोथ, ऊरुस्तम्भ, कफके रोग, अर्श, कामला, प्रमेह और प्लीहा आदि रोगोंको नष्ट करते हैं ५९-६३
चन्द्रसूर्यात्मक रस ।
सूतकं गन्धकं लौहमभ्रकं च पलं पलम् ।
शङ्कटङ्कवराटं च प्रत्येकार्द्धपलं हरेत् ॥ ६४ ॥
गोक्षुरबीजचूर्णं च पलैकं तत्र दीयते ।
सर्वमेकीकृतं चूर्णं बाष्पयन्त्रे विभावयेत् ॥ ६५ ॥
पटोलं पर्पटं भार्ङ्गीं विदारी शतपुष्पिका ।
कुण्डली दन्तिनी वासा काकमाचीन्द्रवारुणी ॥ ६६ ॥
वर्षाभूः केशराजश्च शालिञ्ची द्रोणपुष्पिका ।
प्रत्येकार्द्धपलैर्द्रवैर्भावयित्वा वटीं कुरु ॥ ६७ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक चार चार तोले, शङ्खभस्म, सुहागा, कौड़ीकी भस्म ये तीनों दो दो तोले और गोखुरूके बीजोंका चूर्ण ४ तोले लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्णको पटोलपात पित्तपापड़ा, भारंगी, विदारीकन्द, सौंफ, गिलोय, दन्तीमूल, अडूसा, मकोय, इंद्रायन, पुनर्नवा, भांगरा, शालिञ्चशाक और गूमा इन प्रत्येक ओषधिके दो दो तोले स्वरसके साथ गरम खरलमें डालकर क्रमसे भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ६४-६७ ॥
चतुर्द्दशवटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः ।
युक्त्या मद्येन मण्डेन मुद्गयूषेण वारिणा ॥ ६८ ॥
गुडूचीत्रिफलावासाक्वाथनीरेण वा क्वचित् ॥ ६८ ॥
इन गोलियोंमेंसे एक एक गोली नित्य प्रातःकाल बकरीके दूधके साथ अथवा मदिरा, मांड, मूँगका यूष, जल या गिलोय, त्रिफला और अडूसा इनमें किसी एकके काढ़ेके साथ चौदह दिनतक सेवन करे ॥ ६८ ॥
हलीमकं निहन्त्याशु पाण्डुरोगं च कामलाम् ।
जीर्णज्वरं सविषमं रक्तपित्तमरोचकम् ॥ ६९ ॥
शूलं प्लीहोदरानाहमष्ठीलागुल्मविद्रधीन् ।
शोथं मन्दानलं कासं श्वासं हिक्कां वमिं भ्रमिम् ॥ ७० ॥