भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ४३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ पाण्डु-आदि - |
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एतानि समभागानि मण्डूरं द्विगुणं ततः ।
गोमूत्रेऽष्टगुणे पक्त्वा स्थापयेत्स्निग्धभाजने ।
पाण्डुशोथोदरानाहशूलार्शःकृमिगुल्मनुत् ॥ ५८ ॥
पुनर्नवा, निसोत, सोंठ, पीपल, मिरच, वायविडंग, देवदारु, चीतेकी जड, पोहकरमूल, त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी, दन्तीमूल, चव्य, इन्द्रजौ, कुटकी, पीपलामूल और नागरमोथा इन सबको समान भाग लेवे और सब चूर्णसे दुगुना मण्डूर लेवे। प्रथम मण्डूरको अठगुने गोमूत्रमें पकावे। जब वह पककर सिद्ध होजाय तब उक्त ओषधियोंका चूर्ण डालकर नीचे उतारलेवे। शीतल होजानेपर उसको एक घीके चिकने बर्तनमें भरकर रखदेवे। यह मण्डूर प्रतिदिन तीन तीन माशे परिमाण सेवन करनेसे पाण्डु, शोथ, उदररोग, आनाह, शूल, अर्श, कृमि और गुल्म आदि रोगा को नष्ट करता है ॥ ५६–५८ ॥
त्र्यूषणादिमण्डूर ।
त्र्यूषणं त्रिफला मुस्तं विडङ्गं चव्यचित्रकौ ।
दार्वीत्वङ्माक्षिको धातुर्ग्रन्थिकं देवदारु च ॥ ५९ ॥
एषां द्विपलिकान्भागाँश्चूर्णान्कृत्वा पृथक् पृथक् ।
मण्डूरं द्विगुणं चूर्णाच्छुद्धमञ्जनसन्निभम् ॥ ६० ॥
मूत्रे चाष्टगुणे पक्त्वा तस्मिंस्तु प्रक्षिपेत्ततः ।
उदुम्बरसमान्कृत्वा वटकांस्तान् यथाग्नि तु ॥ ६१ ॥
उपयुञ्जीत तक्रेण सात्म्यं जीर्णे च भोजनम् ।
मण्डूरवटका ह्येते प्राणदाः पाण्डुरोगिणाम् ॥ ६२ ॥
कुष्ठान्यरोचकं शोथमूरुस्तम्भं कफामयान् ।
अर्शोसि कामलां मेहान् प्लीहानं शमयन्ति च ॥ ६३ ॥
सोंठ, मिरच, पीपल त्रिफला, नागरमोथा, वायविडङ्ग, चव्य, चीतेकी जड, दारुहल्दी, दारचीनी, सोनामाखी, गठिवन और देवदारु इन सबको पृथक् पृथक् आठ आठ तोले लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे फिर सब चूर्णसे दुगुना अञ्जनकी समान काला शुद्ध मण्डूर लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे। जब पाक तैयार होजाय तब उसमें पूर्वोक्त औषधियोंका चूर्ण मिलाकर गूलरके फलकी समान बडे बनालेवे। इन बडोंको अपनी अग्निका बलाबल विचारकर प्रतिदिन मट्ठेके साथ सेवन करे और जीर्ण होनेपर हितकर पदार्थोंका भोजन करे।