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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 457 of 1416

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Page 457

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२५


पाण्डु-कामला-हलीमककी चिकित्सा ।

साध्यं च पाण्ड्वामयिनं समीक्ष्य स्निग्धं घृतेनोर्ध्वमधश्च शुद्धम् ।
सम्पाचयेत्क्षौद्रघृतप्रगाढैर्हरीतकीचूर्णमयः प्रयोगैः ॥ १ ॥

प्रथम पाण्डुरोगीको साध्य देखकर उसे घृतके द्वारा स्निग्ध करके वमन और विरेचन कराकर शरीरको शुद्ध करे । फिर शहद और घृतमें मिलाकर हरड़ोंका चूर्ण सेवन करावे ॥ १ ॥

पिबेद् घृतं वा रजनीविपक्वं यत् त्रफलं तैन्दुकमेव वापि ।
विरेचनद्रव्यकृतान्पिबेद्वा योगांश्च वैरेचनिकान् घृतेन ॥ २ ॥

हल्दीके कल्क और क्वाथसे सिद्ध किया हुआ घृत अथवा त्रिफलेके क्वाथ और कल्कके द्वारा सिद्ध कियाहुआ वा तेन्दूके कल्क और क्वाथसे सिद्ध किया घृत पान करे या विरेचन औषधियोंको घृतके साथ अथवा विरेचन औषधियोंके द्वारा सिद्ध कियेहुये घृतको पान करे ॥ २ ॥

विधिः स्निग्धश्च वातोत्थे तिक्तशीतश्च पैत्तिके ।
श्लैष्मिके कटुरूक्षोष्णः कार्यो मिश्रस्तु मिश्रके ॥ ३ ॥

वातज पाण्डुरोगमें स्निग्धक्रिया, पित्तज पाण्डुरोगमें कडवे पदार्थोंका सेवन और शीतलक्रिया, कफज पाण्डुरोगमें, चरपरे और रूखे पदार्थोंका सेवन एवं उष्णक्रिया करे तथा मिलेहुए दोषोंवाले पाण्डुरोगमें मिश्रित क्रिया करनी चाहिये ॥

पाण्डुरोगे सदा सेव्या सगुडा च हरीतकी।
पाण्डुरोगमें सर्वदा हरडका चूर्ण गुड मिलाकर सेवन करना चाहिये ।

त्रिफलाक्वथितं तोयं सघृतं च सशर्करम् ।
वातपाण्ड्वामयी पीत्वा स्वास्थ्यमाशु व्रजेद् ध्रुवम् ॥ ४ ॥

वातज पाण्डुरोगी त्रिफलेके क्वाथमें घी और मिश्री मिलाकर सेवन करे तो शीघ्र आरोग्य होता है ॥ ४ ॥

द्विशर्करं त्रिवृच्चूर्णं पलार्द्धं पैत्तिके पिबेत् ।
कफपाण्डौ च गोमूत्रयुक्तां क्लिन्नां हरीतकीम् ॥ ५ ॥
नागरं लोहचूर्णं वा कृष्णं पथ्यां तथाऽश्मजम् ।
गुग्गुलुं वाऽथ मूत्रेण कफपांड्वामयी पिबेत् ॥ ६ ॥