भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context४२४ भैषज्यरत्नावली । [ कृमिरोग
पथ्या च तैलं तिलसर्षपोद्भवं सौवीरशुक्तं च तुषोदकं
मधु । पचेलिमं तालमरुष्करं गवां मूत्रं च ताम्बूलसुरा-
मृगाण्डजम् ॥६३॥ उष्ट्रस्य मूत्राज्यपयांसि रामठं क्षारा-
जमोदा खदिरं च वत्सकम् । जम्बीरनीरं सुषवी यमा-
निका साराः सुराह्वागुरुशिंशपोद्भवाः । तिक्तः कषायः
कटुको रसोऽप्ययं वर्गो नराणां कृमिरोगिणां सुखः ॥६६॥
आस्थापन वस्ति (पिचकारी) देना, कायविरेचन (जुलाब) और शिरोविरेचन (नस्य) देना, कफनाशकपदाथोंका धूम्रपान कराना, शरीरको मार्जन करना या उबटन करना, बाँसके और लालशालिधानोंके पुराने चावल, परवल, बेंतके अंकुर, लहसुन, बथुआ, चीतेके पत्तोंका शाक, आकके पत्ते, सरसोंके पत्ते, नवीन केलेका मोचा, बडी कटेरीके फल, डवे पदार्थ, नाडीका शाक, चूहेका मांस, वायविडंग, नीमके पत्ते, हरड, तिल और सरसोंका तैल सौवीरनामक काँजी, सिरका, तुषोदकनामक काँजी, शहद, पके ताडके फल, भिलावे, गोमूत्र, पान, मदिरा, कस्तूरी, ऊँटका मूत्र, घी, दूध, हींग, जवाखार, अजमोद, खैर, इन्द्रजौ, जम्बीरीनींबूका रस, करेले, अजवायन, देवदारु, अगर और शीशमके वृक्षका सार तथा कडवे, कषैले और चरपरे रसवाले पदार्थ ये कृमिरोगवाले मनुष्योंके लिये हितकारी हैं॥६३-६६॥
कृमिरोगमें अपथ्य ।
छर्दिं च तद्वेगविधारणं च विरुद्धपानाशनमह्नि निद्राम् ।
द्रवं च पिष्टान्रमजीर्णतां च घृतानि माषान्दधि पत्रशाकम् ॥
मांसं पयोऽम्लं मधुरं रसं च कृमीञ्जिघांसुः परिवर्जयेच्च॥६७॥
वमनको और वमनके वेगको रोकना, प्रकृति विरुद्ध अन्न-पान करना, दिनमें सोना, द्रव (पतले) पदार्थ, मिठाई, पक्वान्न आदि अजीर्णकारक पदार्थ, घी, उडद, दही, पत्तेवाले शाक, मांस, दूध, खट्टे रसवाले और मधुर रसवाले पदार्थ—ये सब कृमिरोगवालोंको तत्काल त्याग देने चाहिये ॥ ६७ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां कृमिरोगचिकित्सा ।