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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 445 of 1416

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Page 445

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१३

विरेचन, मल-मूत्र और अधोवायुके वेगको रोकना, भोजनपर भोजन करना, अपथ्य पदार्थोंका भोजन, रातको जागना, विषमभोजन, रक्तमोक्षण, सब प्रकारके दो दलवाले अन्न, मछली, मांस, पोईका शाक, अधिक जलपान, पिष्टक, जामुन, सर्व प्रकारके आलू आदि कन्द, फटा हुआ दूध, खीस, मद्य अधिक शरबत व पन्ना ( मिष्टान्न पकवान आदि ), ताडके फलकी गुठलीकी मींग, घी-तैलादि स्नेहपदार्थ, दूषितजल, स्वभावविरुद्ध व प्रकृतिविरुद्ध और असात्म्य अन्नपान विष्टम्भकारक और गुरुपाकी पदार्थ समस्त मन्दाग्नि और अजीर्णरोगमें सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥ २२६-२२९ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् अग्निमान्द्यचिकित्सा ।


कृमिरोग-चिकित्सा ।

पारसीययमानीं पीत्वा पर्युषितवारिणा प्रातः ।
गुडपूर्वां कृमिजातं कोष्ठगतं पातयत्याशु ॥ १ ॥

प्रातःकालमें खुरासानी अजवायनके चूर्ण किंचित् गुड मिलाकर बासी जलके साथ पीनेसे मलके साथ कोष्ठगत कृमि तत्काल निकल जाते हैं ॥ १ ॥

पारिभद्रकपत्रोत्थं रसं क्षौद्रयुतं पिबेत् ।
केबूकस्य रसं वापि पत्तूरस्याथवा पुनः ॥

फरहदके पत्तोंके रसको वा केउआँके अथवा पतङ्गरके पत्तोंके रसको शहद मिलाकर पान करनेसे सब प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं ॥

लिह्यात् क्षौद्रेण वैडङ्गं चूर्णं कृमिहरं परम् ॥ २ ॥

वायविडंगके चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे यह चूर्ण सब प्रकारके कृमिको नष्ट करता है ॥ २ ॥

मुस्ताखुकर्णीफलशिग्रुदारुक्वाथः सकृष्णाकृमिशत्रुकल्कः ।
मार्गद्वयेनापि चिरप्रवृत्तान् क्रिमीन्निहन्ति क्रिमिजांश्च रोगान् ॥

नागरमोथा, मूसाकानी, हरड, आमला, बहेडा, सहिंजनेकी छाल और देवदारु इनके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और वायविडङ्गका चूर्ण डालकर पान करनेसे ऊर्ध्व और अधः इन दोनों मार्गोंसे निकलनेवाले बहुत दिनोंके कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य उपद्रव नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥