भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context४०८ | भैषज्यरत्नावली | [ अग्निमान्द्य-
मिलादेवे। पश्चात् उसको एक उत्तम मिट्टीके चिकने पात्रमें भरकर उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्दकरके रखदेवे। एक महीनेतक रक्खा रहनेके बाद निकालकर उसको वस्त्रमें छानलेवे। फिर इसको अग्निके बलानुसार सेवन करे तो यह मुस्तकारिष्ट अजीर्ण, मन्दाग्नि, दारुण विषूचिका, विविध प्रकारकी संग्रहणी आदि रोगोंको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥ १९०–९३ ॥
चित्रकगुड ।
नासारोगे विधातव्या या चित्रकहरीतकी ।
विना धात्रीरसं सोऽस्मिन् प्रोक्तश्चित्रगुडोऽग्निदः ॥९४॥
नासारोगमें जो चित्रक हरीतकी नामक औषधि कहीगई है। उसमें यदि आमलोंका रस न डाला जाय तो वह ही चित्रकगुड होजाता है ऐसा आयुर्वेदाचार्योंने कहा है। यह चित्रकगुड अत्यन्त अग्निप्रदीपक हैं ॥ ९४ ॥
क्षारगुड ।
द्वे पञ्चमूले त्रिफलामर्कमूलं शतावरीम् ।
दन्तीं चित्रकमास्फोटां रास्त्रां पाठां सुधां शठीम् ॥९५॥
पृथग् दशपलान् भागान् दग्ध्वा भस्म समावपेत् ।
त्रिःसप्तकृत्वस्तद्भस्म जलद्रोणे च गालयेत् ॥ ९६ ॥
तद्रसं साधयेदग्नौ चतुर्भागावशेषितम् ।
ततो गुडतुलां दत्त्वा साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ९७ ॥
सिद्धं गुडं तु विज्ञाय चूर्णानीमानि दापयेत् ।
वृश्चिकाली द्विकाकोल्यौ यवक्षारं समावपेत् ॥ ९८ ॥
एते पंचपला भागाः पृथक् पञ्च पलानि च ।
हरीतकीं त्रिकटुकं स्वर्जिकां चित्रकं वचाम् ॥ ९९ ॥
हिंग्वम्लवेतसाभ्यां च द्वे पले तत्र दापयेत् ।
अक्षप्रमाणां गुटिकां कृत्वा खादेद्यथाबलम् ॥ २०० ॥
दशमूल, त्रिफला, आककी जड शतावर, दन्तीकी जड, चीतेकी जड, विष्णुक्रान्ता, रास्ना, पाठ, थूहरकी जड और कचूर ये प्रत्येक औषधि चालीस चालीस तोले लेकर अग्निमें जलाकर भस्म करलेवे। फिर उस भस्मको एक द्रोण जलमें मिलाकर २१ बार छाने पश्चात् उसको मन्दमन्द अग्निसे पकावे