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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 439 of 1416

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Page 439

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०७

पीपल, अदरख, देवदारु, चीतेकी जड, चव्य, बेलगिरी, अजमोद, हरड, सोंठ, अजवायन, धनियां, मिरच, जीरा ये प्रत्येक औषधि समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णको अष्टमांश सबको अठगुनी हींग काँजी और काँजीसे चौगुने जलमें मिलाकर पकावे और जब पककर कांजीमात्र शेष रह जाय तब उतारकर छान लेवे ॥८५॥८६॥

एष शार्दूलको नाम काञ्जिकोऽग्निबलप्रदः ।
सिद्धार्थतैलसम्भृष्टो दशरोगान् व्यपोहति ॥ ८७ ॥
कासं श्वासमतीसारं पाण्डुरोगं सकामलम् ।
आमं च गुल्मरोगं च वातशूलं सवेदनम् ॥ ८८ ॥
अर्शोसि श्वयथुं चैव भुक्ते पीते च सात्म्यतः ।
क्षीरपाकविधानेन काञ्जिकस्यापि साधनम् ॥ ८९ ॥

यह शार्दूलनामक काँजी अत्यन्त अग्निको बढानेवाली है। इसको सफेद सरसोंके तेलमें बघारकर अग्निके बलानुसार सेवन करनेसे यह खाँसी, श्वास, अतिसार, पाण्डु रोग, कामला, आम, गुल्मरोग, अत्यन्त वेदनायुक्त वातशूल, अर्श, शोथ आदि रोगोंको दूर करती है। इसको भोजन करके पान करना चाहिये ॥ ८७-८९ ॥

मुस्तकारिष्ट ।

मुस्तकस्य तुलाद्वन्द्वं चतुर्द्रोणेऽम्बुनः पचेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन् क्षिपेद् गुडतुलात्रयम् ॥ ९० ॥
धातकीं षोडशपलां यमानीं विश्वभेषजम् ।
मरिचं देवपुष्पं च मेथीं वह्निं च जीरकम् ॥ ९१ ॥
पलयुग्ममितं क्षित्वा रुद्ध्वा भाण्डे निधापयेत् ।
संस्थाप्य मासमात्रं तु ततः संस्रावयेद्भिषक् ॥ ९२ ॥
अजीर्णमग्निमान्द्यं च विषूचीमपि दारुणाम् ।
ग्रहणीं विविधां हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ ९३ ॥

नागरमोथा २०० पल लेकर चार द्रोण परिमाण जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उस क्वाथमें गुड ३०० पल, धायके फूल १६ पल, एवं अजवायन, सोंठ, मिरच, लौंग, मेथी, चीतेकी जड और जीरा ये प्रत्येक आठ आठ तोले एवं इन सब औषधियोंका एकत्र चूर्ण करके