भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| ३६८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अग्निमान्द्य- |
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यत्त पथ्यं यदपथ्यं च वक्ष्यते रक्तपित्तिनाम् ॥
रक्तार्शोरोगिणां तत्तदपि विद्याद्विशेषतः ॥ ९ ॥
आनूपदेशके पशुपक्षियोंका मांस, मछली, तिलकूट, दही, पिष्टीके बने पदार्थ, उड़द, बाँसके अंकुर, सेमकी फली, बेल, लाकी, पोईका शाक, पक्का आम, भसींडा एवं सर्व प्रकारके विबन्धकारक गुरुपाकी पदार्थ, धूप, जलपान, वमन, वस्तिकर्म, सर्वप्रकारके प्रकृतिविरुद्ध, देश काल और संयोगविरुद्ध पदार्थ, पूर्वदिशाकी वायु, मलमूत्रादिके वेगको रोकना, स्त्रीप्रसंग, घोडे आदिकी सवारी करना, टेढे तिरछे होकर बैठना, एवं अर्शके दोषको बढानेवाले यथेच्छ अन्न पानादि पदार्थ अर्शरोग-वालेको त्यागदेने चाहिये । रक्तपित्तरोगियोंके लिये जो पथ्यापथ्य कहा गया है वह सब पथ्यापथ्य अर्शमें भी विशेषरूपसे सेवन कराना चाहिये ॥ २०६-२०९ ॥
इति अर्शोरोगचिकित्सा ॥
अग्निमान्द्यचिकित्सा ।
सारमेतच्चिकित्सायाः परमग्नेश्च पालनम् ।
तस्माद्यत्नेन कर्त्तव्यं वन्हेस्तु प्रतिपालनम् ॥ १ ॥
'अस्तु दोषशतं क्रुद्धं सन्तु व्याधिशतानि च ।
कायाग्निमेव मतिमान् रक्षन् रक्षति जीवितम् ॥ २ ॥
जठराग्निको समान भावसे रक्षा करना ही इस रोगकी चिकित्साका प्रधान कर्त्तव्य है, इसलिये सैकड़ों दोषों और सैकड़ों व्याधियोंके कुपित होनेपर भी सबसे पहले यत्नपूर्वक अग्निकी रक्षा करनी चाहिये । कारण, अग्निके क्षीण होजानेपर कोई भी औषधि गुण नहीं करती है । जठराग्निकी रक्षा करताहुआ बुद्धिमान् वैद्य जीवनकी रक्षा करता है ॥ १ ॥ २ ॥
समस्य रक्षणं कार्यं विषमे वातनिग्रहः ।
तीक्ष्णे पित्तप्रतीकारो मन्दे श्लेष्मविशोधनम् ॥ ३ ॥
समाग्निकी सदैव रक्षा करनी चाहिये । विषमाग्निमें वायुकी शान्ति, तीक्ष्णाग्निमें पित्तको शमन करनेवाली और मन्दाग्निमें कफको प्रशमन करनेवाली क्रिया एवं लंघनादि करने चाहिये ॥ ३ ॥