भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६७
जलसे सोलहवाँ भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार तीक्ष्ण वा श्रेष्ठ होता है। क्षारका पाक न अत्यन्त गाढा और न अत्यन्त पतला होना चाहिये । किन्तु जिससे अर्शके अंकुरोंपर सहजही मालिश की जासके इस प्रकारका क्षार पाक करना चाहिये । बवासीर आदि रोगोंमें प्रतिसारण क्षार उत्तम कहागया है और पानीयक्षार गुल्मादिरोगोंमें हितकर है। इस पानीयक्षारको क्षारसे ६ गुने, किसी २ के मतसे ४ गुने जलमें डालकर २१ बार टपकाना चाहिये ॥१९८-२०२ ॥
अर्शरोगमें पथ्य ।
विरेचनं लेपनमस्रमोक्षः क्षाराग्निशस्त्राचरितं च कर्म ।
पुरातना लोहितशालयश्च षष्टिकाश्चापि यवाःकुलित्थाः ॥३
पटोलपत्तूररसोनवह्निपुनर्नवाशूरणवास्तुकानि ।
जीवन्तिका दन्तिशठी सुरा च त्रुटिर्वयःस्था नवनीततक्रम्॥४
कक्कोलधात्रीरुचकं कपित्थमौष्ट्राणि मूत्राज्यपयांसि चापि ।
भल्लातकं सार्षपजं च तैलं गोमूत्रसौवीरतुषोदकानि ॥
वातापहं यच्च यदग्निकारि तदन्नपानं हितमर्शसेभ्यः ॥ ५ ॥
अर्शरोगियोंके लिये विरेचन, प्रलेप, रक्तमोक्षण, क्षार, अग्नि और शस्त्रकर्म, पुराने लाल शालिधानोंके चावल, सांठीके चावल, जौ, कुलथी, परवल, शालिंचशाक, लहसुन, चीता, लालविषखपरा, जिमीकन्द, बथुआ, जीवन्तीका शाक, दन्तीकी जड, कचूर, मद्य, छोटी इलायची, हरड, नैनीघी, मट्ठा, शीतलचीनी, आमला, कालानमक, कैथ, ऊँटका मूत्र घी और दूध, भिलावे, सरसोंका तैल, गोमूत्र, सौवीर-नामक काँजी और तुषोदक नामक काँजी एवं वायुनाशक और अग्निवर्द्धक समस्त अन्न पान हितकारी हैं ॥ ३–५ ॥
अर्शरोगमें अपथ्य ।
आनूपमामिषं मत्स्यं पिण्याकं दधि पिष्टकम् ।
माषान् करीरं निष्पावं बिल्वं तुम्बीमुपोदिकाम् ॥ ६ ॥
पक्वाम्रं शालुकं सर्वं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
आतपं जलपानानि वमनं वस्तिकर्म च ॥ ७ ॥
विरुद्धानि च सर्वाणि मारुतं पूर्वदिग्भवम् ।
वेगरोधं स्त्रियं पृष्ठयानमुत्कटकासनम् ॥
यथास्वं दोषलं चान्नमर्शसः परिवर्जयेत् ॥ ८ ॥