भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context३६४ भैषज्यरत्नावली । [ अर्शोरोग-
विधिपूर्वक तैलको पकावे । इस तैलकी मालिश करनेसे अर्शके अंकुर इस प्रकार निस्सन्देह गिरजाते हैं, जिसप्रकार क्षारसे गुदाके अंकुर नष्ट होजाते हैं । क्षारकी समान कार्य करनेवाला यह तैल अर्शकी वलिको दूषित नहीं करता है ॥८३॥८४॥
पिप्पल्याद्यतैल ।
पिप्पलीं मधुकं बिल्वं शताह्वां मदनं वचाम् ।
कुष्ठं शुण्ठीं पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ ८५ ॥
पिष्ट्वा तैलं विपक्तव्यं द्विगुणक्षीरसंयुतम् ।
अर्शसां मूढवातानां तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥८६॥
गुदनिस्सरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् ।
कट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वङ्क्षणाश्रयम् ॥ ८७ ॥
पिच्छास्रावं गुदे शोथं वातवर्चोविनिग्रहम् ।
उत्थानं बहुशो यच्च जयेच्चैवानुवासनात् ॥ ८८ ॥
पीपल, मुलहठी, बेलगिरी, सोया, मैनफल, वच, कूठ, सोंठ, पुहकरमूल, चीता और देवदारु इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीस लेवे । इस कल्कके द्वारा १ प्रस्थ तेलको दुगुने दूधके साथ मिलाकर पकावे । इस तेलको अर्शरोगियों और वातसे पीडित रोगियोंके अनुवासनबस्तिद्वारा प्रयोग करना श्रेष्ठ है । एवं गुदाका बाहर निकलना, शूल, मूत्रकृच्छ्र प्रवाहिका, कमर, पीठ और जंघाओंकी दुर्बलता, अफारा, वंक्षणकी पीडा, पिच्छिलतायुक्त स्राव, गुदाकी सूजन, वायु और मलका अवरोध ये लक्षण यदि बारबार उत्पन्न हों तो इस तेलकी अनुवासनबस्तिसे इन सब विकारोंको जीतना चाहिये ॥ ८५-८८ ॥
दन्त्यरिष्ट ।
दन्तीचित्रकमूलानामुभयोः पञ्चमूलयोः ।
भागान् पलांशानायोज्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ८९ ॥
त्रिपलं त्रिफलायाश्च दलानां तत्र दापयेत् ।
रसे चतुर्थशेषे तु पूतशीते प्रदापयेत् ॥ ९० ॥
तुलां गुडस्य तिष्ठेन्मासार्द्धं घृतभाजने ।
तन्मात्रया पिबेन्नित्यमर्शोभ्यः प्रविमुच्यते ॥ ९१ ॥