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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 395 of 1416

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Page 395

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६३


एतदर्शस्स्वतीसारे त्रिदोषे रुधिरस्रुतौ ।
प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ ७९ ॥
उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये ।
मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ १८० ॥
प्रयोज्य विधिवत् सर्पिर्बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ।
विविधेष्वनुपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ ८१ ॥

इस घृतको सर्वप्रकारके अर्शरोग, अतिसार, त्रिदोषज रक्तस्राव, प्रवाहिका, गुदभ्रंश, नानाप्रकारकी पिच्छिलता, बारबार मलका निकालना, गुदागत शोथ अथवा शूल, मूत्राशयसम्बन्धी रोग, मूढवात, मन्दाग्नि, अरुचि आदि रोगोंमें विविधप्रकारके अनुपानोंके साथ अथवा केवल घृतको ही विधिपूर्वक सेवन करानेसे उक्त समस्त विकार दूर होते हैं एवं बल वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है ॥ ८१ ॥

कासीसाद्यतैल ।

कासीस दन्तिसिन्धूत्थकरवीरानलैः पचेत् ।
तैलमर्कपयोमिश्रमभ्यङ्गात् पायुकीलजित् ॥ ८२ ॥

कसीस, दन्तीकी जड, सैंधानमक, कनेरकी जड और चीतेकी जड इन प्रत्येकके एकएक तोले कल्कके द्वारा एक प्रस्थ प्रमाण तिलके तैलको पकावे। फिर आकके दूधमें मिलाकर मालिश करनेसे अर्शके अंकुरोंको दूर करता है ॥ ८२ ॥

बृहत्कासीसाद्यतैल ।

कासीसं सैन्धवं कृष्णा शुण्ठी कुष्ठं च लाङ्गली ।
शिलाभिदश्वमारश्च दन्ती जन्तुघ्नचित्रकम् ॥
तालकं कुनटी स्वर्णक्षीरी चैतैः पचेद्भिषक् ॥ ८३ ॥
तैलं स्नुह्यर्कपयसा गवां मूत्र चतुर्गुणम् ।
एतदभ्यङ्गतोऽर्शांसि क्षारेणेव पतन्ति हि ॥
क्षारकम्मकरं ह्येतन्न च सन्दूषयेद्वलिम् ॥ ८४ ॥

कसीस, सेंधानमक, पीपल, सोंठ, कूठ, कलिहारीकी जड, पाषाणभेद, कनेरकी जड, दन्तीकी जड, वायविडङ्ग, चीतेकी जड, हरताल, मैनासिल, पीले फूलकी सत्यानासी, कटेरी इन सबको समान भाग एवं तिलका तैल एक प्रस्थ थूहरका दूध १ प्रस्थ, आकका दूध १ प्रस्थ और गोमूत्र ४ प्रस्थ लेवे। सबको एकत्र मिलाकर