भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 392 of 1416
Read in context| ३६० | भैषज्यरत्नावली । | [ अर्शोरोग- |
|---|
नित्योदित रस ।
शुद्धसूताभ्रलोहार्कविषं गन्धं समं समम् ।
सर्वतुल्यं तु भल्लातफलमेकत्रः चूर्णयेत् ॥ ६२ ॥
द्रवैः शूरणकन्दोत्थैः खल्ले मर्द्यं दिनत्रयम् ।
माषमात्रं लिहेदाज्यं रसश्चार्शांसि नाशयेत् ॥
रसो नित्योदितो नाम गुदोद्भवकुलान्तकः ॥ ६३ ॥
शुद्ध पारा, अभ्रक, लोहा, ताँबा, शुद्ध मीठातेलिया और शुद्ध गन्धक ये सब समान भाग और सबकी बराबर भाग भिलावे लेकर सबको एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर जिमीकन्द और मानकन्दके रसमें तीन दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करके इसमेंसे प्रतिदिन एक एक माशे परिमाण रसको घीके साथ मिलाकर चाटे तो सर्व प्रकारके अर्शरोग नष्ट होते हैं । विशेषकर यह नित्योदित नामक रस बवासीरको समूल नष्ट करते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥
अष्टाङ्गरस ।
गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं त्र्युषणवह्निभृङ्गरम् ।
कृत्वा समं शाल्मलिकागुडूचीरसेन यामत्रितयं विमर्द्य ॥
निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥६४
शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, लोहभस्म, मण्डूरभस्म, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, चीता और भाँगरा इन सबको समान भाग लेकर सेमलकी मूसली और गिलोय प्रत्येकके रसमें तीन प्रहरतक खरल करके ४-४ माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली प्रतिदिन घृतके साथ खानेसे सम्पूर्ण अर्शरोग दूर होता है ॥ ६४ ॥
उदकषट्पलकघृत ।
सक्षारैः पञ्चकोलैस्तु पलिकैस्त्रिगुणोदकैः ।
समं क्षीरं घृतं प्रस्थं ज्वरार्शःप्लीहकासनुत् ॥ ६५ ॥
जवाखार, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड और सोंठ ये प्रत्येक ४-४ तोले, जल सब औषधियोंसे तिगुना, दूध एक प्रस्थ और घी एक प्रस्थ लेवे सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत ज्वर, बवासीर प्लीहा, खांसी आदि विकारोंकों दूर करता है ॥ ६५ ॥