भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६९
मैनसिल और गन्धकके चूर्णको अलग अलग भाँगरेके रसमें १ सप्ताह तक भावना देकर घी और शहदके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत करलेवे। इसके खानेसे अर्शरोगीके वायुका अनुलोमन होता है, नष्ट हुई अग्नि पुनः दीपन होती है और कुष्ठादि उपसर्गोंसे रहित होकर मनुष्य आरोग्य होता है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
जातीफलादिवटी ।
जातीफलं लवङ्गं च पिप्पली सैन्धवं तथा ।
शुण्ठी धुस्तूरबीजं च दरदं टङ्कणं तथा ॥ ५७ ॥
समं सर्वे विचूर्ण्याथ जम्भीराम्भसा विमर्दयेत् ।
जातीफलवटी चेयमर्शोऽग्निमान्द्यनाशिनी ॥ ५८ ॥
जायफल, लौंग, पीपल, सेंधानमक, सोंठ, धतूरेके बीज, सिंगरफ और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर जम्बीरी नींबूके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ तैयार करलेवे । यह जातीफलाद्यवटी सर्वप्रकारके अर्शरोग और मन्दाग्निको नष्ट करती है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
पञ्चाननवटी ।
मृतसूताभ्रलोहानि मृतार्कगन्धकैः सह ।
सर्वाणि समभागानि भल्लातं सर्वतुल्यकम् ॥ ५९ ॥
वन्यशूरणकन्दोत्थर्द्रवैः पलप्रमाणतः ।
मर्दयेद्दिनमेकं च माषमात्रं पिबेद् घृतैः ॥ १६० ॥
भक्षणाद्धन्ति सर्वाणि चार्शांसि च न संशयः ।
असाध्येष्वपि कर्त्तव्या चिकित्सा शङ्करोदिता ॥
कुष्ठरोगं निहन्त्याशु मृत्युरोगविनाशिनी ॥ ६१ ॥
रससिन्दूर, अभ्रक, लोहा, ताँबा और शुद्ध गन्धक ये सब समान भाग और शुद्ध भिलावे सबकी बराबर भाग लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर ४ तोले प्रमाण जंगली जिमीकन्दके रसमें खरल करके एक एक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली घृतके साथ पान करे । इस वटीके सेवन करनेसे सर्वप्रकारके अर्शरोग निस्सन्देह नष्ट होते हैं। इस वटीके द्वारा असाध्य रोगोंमें भी चिकित्सा करनी चाहिये ऐसा शंकरने कहा है । यह वटी कुष्ठरोग और मृत्युरोगको तत्काल नाश करनेवाली है ॥ ५९-१६१ ॥