भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context३२० | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी-
पदार्थ तथा शहद सेवन करे । काली मछली, दूध और जंगलीजीवोंके मांसका पथ्य देवे । जंगली जीवोंमें खरगोश या बकरेका मांस तथा रोहू मछली और मद्गुर मछली उत्तम है । शाकोंमें परवल, पटोलपत्र, काले बैंगन और तोरई, पकाई हुई सुपारी, इलायची और कपूर लगाहुआ पान खाना हितकारी है ॥ ६८-७१ ॥
क्षुधाकाले व्यतिक्रान्ते यदि वायुः प्रकुप्यति ।
झीञ्झिनीति शिरःशूले विरेके वमने तथा ॥ ७२ ॥
तृष्णायां चाधिके पित्ते नारिकेलाम्बु निर्भयम् ।
नारिकेलपयः पेयं द्विर्भक्ष्यं क्षीरमेव च ॥ ७३ ॥
स्वप्ने शुक्रच्युतौ चैव-
भोजनके समय उल्लंघन होनेपर वायुके कुपित हो जानेसे शिरमें झिरझिनाहट, पीडा, विरेचन (दस्त), वमन (कै) ये उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं। उस समय तृष्णा और पित्तकी अधिक वृद्धि होनेपर निर्भय होकर कच्चे नारियलका जल पान करना चाहिये । जलमें नारियलका जल और प्रतिदिन दो बार दूध पिलाना चाहिये । यदि स्वप्नमें वीर्यपात होजाय तो दुग्धपान करे ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
चम्पकं कदलीफलम्
वर्ज्यं निम्बादिवा शाकं शाकाम्लं काञ्जिकं सुराम् ॥७४॥
कदलीफलपत्राङ्घ्रित्रपुषालाबुकर्कटी ।
कूष्माण्डं कारवेल्लं च व्यायामं जागरं निशि ॥ ७५ ॥
न पश्येन्न स्पृशेच्चैव स्त्रियं जीवितुमिच्छति ।
यद्यौषधे स्त्रियं गच्छेत् कर्त्तव्या तु प्रतिक्रिया ॥ ७६ ॥
इसपर चम्पा, केलेके, पत्ते, निम्बादिशाक, खट्टे पदार्थ, काँजी, मदिरा, केलेकी फली, पत्रांघ्रि, खीरा, लौकी, ककडी और करेला ये सब पदार्थ कसरत आदि परिश्रम और रातमें जागना ये सब त्याज्य हैं। जीनेकी इच्छा करनेवाला पुरुष स्त्रीको न देखे न स्पर्श करे और औषधि सेवन करते समय यदि किसी कारणसे स्त्रीसहवास करे तो उसका विशेषरूपसे प्रतीकार (चिकित्सा) करना ॥ ७४-७६ ॥
दुर्वांरां ग्रहणीं हन्ति दुःसाध्यां बहुवार्षिकीम् ।
आमशूलमतीसारं सामं चैव सुदारुणम् ॥ ७७ ॥