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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 351 of 1416

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३१९


दीखता. मृदुपाकमें पारा अच्छे प्रकारसे नहीं टूटता किन्तु मध्यपाकमें चाँदीकी समान टूट जाता है और खरपाकम बहुत थोडा टूटता है। खरपाकमें पारा रूक्ष, सूक्ष्म और लालवर्णका होता है। इनमेंसे मृदु और मध्यपाककी पर्पटी सेवन करनी चाहिये और खरपाककी पर्पटी विषकी समान त्याग देनी चाहिये ॥ ६३ ॥ ६४ ॥

ज्वरव्याधिशताकीर्णं विश्वं दृष्ट्वा पुरा हरिः ।
चकार पर्पटीमेतां यथा नारायणोऽमृतम् ॥६५॥

पूर्वकालमें विष्णुभगवान्ने जरा और व्याधिसे आक्रान्तहुए इस विश्वको देखकर इस विजयपर्पटीको बनायाथा, जो अमृतके समान हितकारी है ॥ ६५ ॥

आदौ शङ्करमभ्यर्च्य द्विजातीन् प्रणिपत्य च ।
प्रभाते भक्षयेदेनां प्राग्रक्तिद्वयसम्मिताम् ॥६६॥
रक्तिकादिक्रमाद् वृद्धिर्भक्ष्या नैव दशोपरि ।
आरोग्यदर्शनं यावत् तावद् ह्रासस्ततः परम् ॥६७॥

पहिले दिन प्रातःसमय इसको २ रत्ती प्रमाण भक्षण करे। फिर प्रतिदिन १-१ रत्तीके क्रमसे बढाताहुआ दस रत्तीतक बढाकर सेवन करावे। जब दश रत्तीकी मात्रा होजाय तब क्रमसे १-१ रत्ती घटाता जाय किन्तु इस दश रत्तीसे अधिक मात्रा नहीं बढानी चाहिये इस प्रकार जबतक उत्तम प्रकारसे आरोग्य न होजाय तबतक उसी प्रकार क्रमसे बढाकर और फिर घटाकर उसका सेवन करता रहे ६६-६७

अजीर्णे भोजनं नैव पथ्यकालव्यतिक्रमे ।
घृतसैन्धवधन्याकहिङ्गुजीरकनागरैः ॥६८॥
शस्यते व्यञ्जनं सिद्धं पित्ते स्वाद्वम्लमाक्षिकम् ।
कृष्णमत्स्येन दुग्धेन मांसेन जाङ्गलेन च ॥६९॥
जाङ्गलेषु शशच्छागौ मत्स्यौ रोहितमद्गुरौ ॥७०॥
पटोलफलपक्वं च कृष्णवार्त्ताकुजालिका ।
सुस्विन्नपूगैस्ताम्बूलैर्लाभे कर्पूरसंयुतैः ॥ ७१ ॥

इसके सेवन करनेपर यदि अजीर्ण होजाय तो भोजनके समयका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। एवं घृत, सैंधानमक, धनियाँ, हींग, जीरा, सोंठ इनके द्वारा सिद्ध किये हुए व्यंजन खाने चाहिये। किन्तु पित्तकी अधिकता होनेपर मधुर और खट्टे