भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३०७
जातीकोषफले चैव तत्समं तु वराङ्गकम् ।
सर्वेषामर्द्धभागं तु विडकं तत्र मिश्रयेत् ॥ २३ ॥
सर्वमेकीकृतं यद्यत् त्रुटिचूर्णं च तत्समम् ।
भावना च प्रदातव्या च्छागीदुग्धेन सप्तधा ॥ २४ ॥
मातुलुङ्गरसैः पश्चाद् भावयेत सप्तवारकम् ।
छायाशुष्कां वटीं कृत्वा भक्षयेद्दशरक्तिकाम् ॥ २५ ॥
कान्तलोहभस्म ३ तोले, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, मोतीकी भस्म और सोनामाखी ये प्रत्येक एकएक कर्ष, एवं सोना चाँदीकी भस्म, सुहागा, काकडासिंगी, गजपीपल, दन्तीकी जड, मिर्च, तेजपात, अजवायन, सुगन्धवाला, नागरमोथा, सोंठ, धनियां, सैंधानमक, कपूर, वायविडङ्ग, चीता, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक प्रत्येक एक एक तोला, निसोतका चूर्ण दो तोले तथा लौंग, जावित्री और दालचीनी ये प्रत्येक आठ आठ तोले इन सब औषधियोंके चूर्णसे आधा भाग विरियासंचर नमक और समस्त चूर्णकी बराबर छोटी इलायचीका चूर्ण लेवे। फिर इन सबको एकत्र करके बकरीके दूधमें सात बार खरल करके बिजौरे नींबूके रसमें सातवार खरल करे फिर छायामें सुखाकर दस दस रत्तीकी गोलियाँ बनाकर भक्षण करे ॥ १९–३२५ ॥
मन्दानलं संग्रहणीं प्रवृद्धामामानुबन्धीं कृमिपाण्डुरोगम् ।
छर्द्यम्लपित्तं हृदयामयं च गुल्मोदरानाहभगन्दरं च ॥ २६ ॥
अशांसि वै पित्तकृतानशेषान् सामं सशूलाष्टकमेव हन्ति ।
साजीर्णविष्टम्भविसर्पदाहं विलम्बिकां चाप्यलसं प्रमेहम् ॥ २७ ॥
कुष्ठान्यशेषाणि च कासशोषं हन्यात् सशोथं ज्वरमूत्रकृच्छ्रम् ।
मतान्तरे सर्वतोभद्रनाम महेश्वरेणैव विभाषितोऽयम् ॥ २८ ॥
इससे मन्दाग्नि, प्रबल संग्रहणी, कृमि, पाण्डुरोग, वमन, अम्लपित्त, हृदयरोग अर्शादि उपर्युक्त समस्त रोग दूर होते हैं। कोई २ आचार्य इस रसको सर्वतोभद्र कहते हैं ॥ २६-३२८ ॥
महाराजनृपवल्लभ ।
माक्षिकं लौहमभ्रं च वङ्गं रजतहाटकम् ।
ग्रन्थिर्यमानिका चोचं ताम्रं नागरटङ्गणम् ॥ २९ ॥