भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context२६२ · भैषज्यरत्नावली । [ग्रहणी-
पाठ, बेलगिरी, चीतेकी जड, सोंठ, पीपल, मिरच, जामुनकी छाल, अनारके बक्कल, धायके फूल, कुटकी, अतीस, नागरमोथा, दारुहल्दी, चिरायता और इन्द्रजौं इन सबके चूर्णको समानभाग और सम्पूर्ण चूर्णकी समान कुडेकी जडंकी छालका चूर्ण सबको एकत्र मिलाकर चावलोंके जल और मधुके साथ पान करनेसे वमन, ज्वरातीसार, शूल, तृषा, दाह, संग्रहणी, अरुचि, अग्निमान्द्य आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥
कपित्थाष्टकचूर्ण ।
यमानीपिप्पलीमूलचातुर्जातकनागरैः ।
मरिचाग्निलाजाजीधान्यसौवर्चलैः समैः ॥ १३ ॥
वृक्षाम्लधातकीकृष्णाबिल्वदाडिमतिन्दुकैः ।
त्रिगुणैः षड्गुणसितैः कपित्थाष्टगुणैः कृतः ॥ १४ ॥
चूर्णोऽतीसारग्रहणीक्षयगुल्मगलामयान् ।
कासश्वासाग्निसादाशःपीनसारोचकाञ्जयेत् ॥ १५ ॥
अजवायन, पीपलामूल, दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, सोंठ, मिरच, लालचीता, सुगन्धवाला, कालाजीरा, धनियाँ और काला नमक इन सब औषधियोंका चूर्ण एक एक भाग एवं तिन्तिडीक, धायके फूल, पीपल, बेलगिरी अनारदाने और तेंदु ये प्रत्येक तीन तीन भाग, मिश्री ६ भाग और कैथका गूदा ८ भाग लेवेँ । सबको एकत्र मिलाकर इस चूर्णको उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो अतीसार संग्रहणी, क्षय, गुल्म, गलेके रोग, खाँसी, श्वास, मन्दाग्नि, बवासीर, पीनस और अरुचि ये सब रोग दूर होते हैं ॥ १३–१५ ॥
स्वल्प-गङ्गाधरचूर्ण ।
मुस्तसैन्धवशुण्ठीभिर्धातकीलोध्रवत्सकैः ।
बिल्वमोचरसाभ्यां च पाठेन्द्रयवबालकैः ॥ १६ ॥
आम्रबीजं चातिविषा लज्जा चैभिः सुचूर्णितम् ।
क्षौद्रतण्डुलतोयाभ्यां जयेत्पीत्वा प्रवाहिकाम् ॥ १७ ॥
सर्वातिसारशमनं सर्वशूलनिषूदनम् ।
संग्रहग्रहणीं हन्ति सूतिकातङ्कमेव च ॥
एतद्गङ्गाधरं चूर्णं सरिद्वेगावरोधनम् ॥ १८ ॥