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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)

Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,416 pages

Page 293 of 1416

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Page 293
[ चिकित्सा ]भाषाटीकासहिता ।२६१

धनियाँ, अतीस, सुगन्धवाला, अजवायन, नागरमोथा, साँठ, खिरेंटी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, और बेलगिरी इनका क्वाथ अग्निको दीपन करनेके लिये एवं दोषोंको पचानेके लिये देना चाहिये ॥ ६ ॥

श्रीफलशलाटुकल्कं नागरचूर्णेन मिश्रितः सगुडः ।
ग्रहणीगदमप्युग्रं तक्रभुजा तु शीलितो जयति ॥ ७ ॥

कच्चे बेलके कल्क और साँठके चूर्णके साथ गुड मिलाकर सेवन करनेसे और ऊपरसे तक्र पान करनेसे अत्यन्त प्रबल ग्रहणीरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ७ ॥

नागराद्यचूर्ण ।

नागरातिविषामुस्तं धातकीं सरसाञ्जनाम् ।
वत्सकत्वक्फलं बिल्वं पाठां कटुकरोहिणीम् ॥ ८ ॥
पिबेत् समांशं तच्चूर्णं सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ।
पैत्तिके ग्रहणीदोषे रक्तं यच्चोपवेश्यते ॥ ९ ॥
अर्शांस्यथ गुदे शूलं जयेच्चैव प्रवाहिकाम् ।
नागराद्यमिदं चूर्णं कृष्णात्रेयेण पूजितम् ॥ १० ॥

सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धायके फूल, रसौंत, कुड़ेकी छाल, इन्द्रजौ, बेलगिरी, पाठ और कुटकी इन सबके समानभाग मिश्रित चूर्णको शहद और चावलोंके पानीके साथ सेवन करनेसे पित्तज संग्रहणी, रक्तज बवासीर, गुदशूल और प्रवाहिकारोग दूर होता है । यह नागराद्यचूर्ण कृष्णात्रेय करके पूजित है ॥ ८–१० ॥

पाठाद्यचूर्ण ।

पाठाबिल्वानलव्योषजम्बूदाडिमधातकी ।
कटुकातिविषामुस्तादार्बीभूनिम्‍बवत्सकैः ॥ ११ ॥
सर्वैरेतैः समं चूर्णं कौटजं तण्डुलाम्बुना ।
सक्षौद्रं च पिबेच्छर्दिज्वरातीसारशूलवान् ॥
तृड्दाहग्रहणीदोषारोचकानलसादजित् ॥ १२ ॥


१ "शीतकषायमानेन तण्डुलोदककल्पना। केऽप्यष्टगुणतोयेन प्राहुस्तण्डुलभावनाम् ॥"
तण्डुलोदककी विधि—शीतकषायके मानके अनुसार तण्डुलोदककी कल्पना करनी चाहिये । कोई ऐसा कहते हैं कि, एक भाग कुटेहुए चावलोंको ८ भाग जलमें रात्रिको भिगो देना चाहिये फिर उसको प्रातःकाल छानकर काममें लाना चाहिये ।