भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in context| २३२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
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अतिसारके रोगीको धनियां और सुगन्धवाला इन औषधियोंके द्वारा पकायाहुआ जल पान करानेसे एवं धनियां, सुगन्धवाला और पाठ इनके द्वारा सिद्ध कीहुई पेया सेवन करानेसे तृषा, दाह और अतिसार नष्ट होता है ॥ १३ ॥
स्तो कं स्तोकं विबद्धं वा सशूलं योऽतिसार्य्यते ।
अभयापिप्पलीकल्कैः सुखोष्णैस्तं विरेचयेत् ॥ १४ ॥
जिस अतिसारके रोगीके बारंबार थोडा २ अथवा अत्यन्त बँधाहुआ और पीडासहित मल निकलता हो तो उसको हरड और पीपलका बारीक चूर्ण मन्दोष्ण जलके साथ पान कराना चाहिये ॥ १४ ॥
नागरातिविषामुस्तैरथवा धान्यनागरैः ।
तृष्णाशूलातिसारघ्नं पाचनं दीपनं लघु ॥ १५ ॥
सोंठ, अतीस और नागरमोथा अथवा धनियां और सोंठ यह दोनों क्वाथ तृषा, शूल और अतिसारको नष्ट करनेवाले, पाचक, अग्निप्रदीपक और हल्के हैं ॥ १५ ॥
पाठावत्सकबीजानि हरीतक्योमहौषधम् ।
एतदामसमुत्थानमतीसारं सवेदनम् ॥
कफात्मकं सपित्तं च वर्चो बध्नाति च ध्रुवम् ॥ १६ ॥
पाठ, इन्द्रजौ, हरड और सोंठ इनका बनायाहुआ क्वाथ पीडासहित आमजन्य अतिसार और कफ तथा पित्तसंयुक्त मलको निस्सन्देह बाँध देता है ॥ १६ ॥
पयस्युत्क्वाथ्य मुस्ता वा विंशतिर्भेदकाह्वया ।
क्षीरावशिष्टं तत् पीतं हन्यादामं सवेदनम् ॥ १७ ॥
नागरमोथेकी बीस जडोंको आठगुने बकरीके दूध और दूधसे चौगुने जलम पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उसको उतारकर छानलेवे । उस दूधंको शीतल करके पान करनेसे वेदनासहित आमातिसार दूर होता है ॥ १७ ॥
धान्यपञ्चकसंसिद्धो धान्यविश्वकृतोऽथवा ।
आहारो भिषजा योज्यो वातश्लेष्मातिसारिणाम् ॥
वातपित्ते पञ्चमूल्या कफे वा पञ्चकोलकैः ॥ १८ ॥
वातकफातिसारवाले रोगियोंको धान्यपञ्चकके साथ अथवा केवल धनिये और सोंठके साथ पेया बनाकर भोजनके लिये देनी चाहिये । एवं वातपित्तातिसारमें स्वल्पपंचमूलकी औषधियोंके साथ और कफके अतिसारमें पञ्चकोलकी औषधियोंके साथ पेया प्रस्तुत कर भोजनके लिये देनी चाहिये ॥ १८ ॥