भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
by कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल)
Source: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (origin)
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Read in contextचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३१
लंघनमेकं त्यक्त्वा नान्यदस्तीह भेषजं बलिनः ।
समुदीर्णं दोषचयं शमयति तत्पाचयत्यपि च ॥ ८ ॥
अतिसारमें बलवान् रोगीके लिये लंघनके सिवाय अन्य कोई औषधि हितकर नहीं है । कारण; लंघन—उत्पन्नहुए दोषोंके समूहको शमन करते हैं और उनको पचा देते हैं ॥ ८ ॥
पक्कोऽपकृदतीसारो ग्रहणीमार्दवाद्यदा ।
प्रवर्तते तदा कार्यः क्षिप्रं सांग्राहिको विधिः ॥ ९ ॥
जब पक्वातिसारमें ग्रहणीनाड़ीके अतिमन्द होजानेसे निरन्तर मल निकलता है तब तत्काल मलावरोधक औषधि देकर दस्त बन्द करदेने चाहिये ॥ ९ ॥
ह्रीबेरशृङ्गबेराभ्यां मुस्तपर्पटकेन वा ।
मुस्तोदीच्यशृतं तोयं देयं वापि पिपासवे ।
युक्तेऽन्नकाले क्षुत्क्षामं लघ्वन्यन्नानि भोजयेत् ॥ १० ॥
अतिसारके रोगीको प्यास लगनेपर सुगन्धवाला और सोंठ अथवा नागरमोथा और पित्तपापडा या नागरमोथा और सुगन्धवाला इनमेंसे किसी एक प्रयोगके द्वारा सिद्ध कियाहुआ जल पीनेको देना चाहिये और लंघनके बाद अत्यन्त भूख लगनेपर हलके अन्नादिकोंका भोजन कराना चाहिये ॥ १० ॥
औषधसिद्धाः पेया लाजानां सक्तवोऽतिसारहिताः ।
वस्त्रप्रस्रुतमण्डः पेया च मसूरंयूषश्च ॥ ११ ॥
शालपर्णी आदि या धान्यपंचकादि अथवा औषधियोंके द्वारा सिद्ध कीहुई पेया, खीलोंके सत्तू, कपडेमें छानाहुआ माँड, पेया और मसूरका यूष अतिसाररोगमें हितकारी है ॥ ११ ॥
गुर्वी पिष्टि खराऽत्यर्थं लघ्वी सैव विपर्य्ययात् ।
सक्तूनामाशु जीर्येत मृदुत्वादवलेहिका ॥ १२ ॥
खीलोंके सत्तूओंमें थोडा जल डालकर उसका पिण्डा या गोलासा बनाकर खानेसे वह अत्यन्त कठिन और गुरुपाकी (देरमें पचनेवाला) होजाता है । किन्तु खीलोंके सत्तूओंको अधिक जलमें घोलकर अवलेहकी समान खानेसे वे शीघ्रही पच जाते हैं ॥ १२ ॥
धान्योदीच्यशृतं तोयं तृष्णादाहातिसारनुत् ।
आभ्यामेव सपाठाभ्यां सिद्धमाहारमाचरेत् ॥ १३ ॥